हमारे शास्त्रों में भगवान विष्णु को इस समस्त ब्रह्माण्ड का स्वामी कहा गया है और उन्हें इस जगत का पालनहार भी कहा जाता है। हमारे हिन्दू कैलेंडर के अनुसार एक माह में दो पक्ष होते है जिन्हे शुक्ल और कृष्ण पक्ष कहा जाता है, जब पूर्णिमा को और बढ़ता हुआ चन्द्रमा होता है तो उसे शुक्ल पक्ष और जब अमावस्या की और बढ़ता हुआ चन्द्रमा होता है तो उसे कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
इन दोनों माह की एकादशी तिथि को ही भगवान विष्णु की तिथि कहा जाता है, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने से मनुष्य को जन्म जन्मांतर के जन्म और मरण से मुक्ति मिल जाती है ऐसा शास्त्रों का मत है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी कहा जाता है और इस बार यह बुद्धवार यानी 19 फरवरी को पड़ रही है।
यह दिन इसलिए भी महत्व रखता है क्यूंकि इस दिन देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने वाले भगवान् गणेश जी का दिन है और साथ में एकादशी तिथि का संयोग इसे और भी पूजनीय बना रहा है। स्कंद पुराण के एकादशी महात्म्य अध्याय में सभी एकादशियों का महत्व बताया गया है। इस एकादशी व्रत के पुण्य फल से सभी कार्यों में विजय यानी सफलता पाने की शक्ति मिलती है।
एकादशी व्रत की बात करे तो इस दिन मनुष्य को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जल्दी स्नान कर लेना चाहिए और सुबह माता तुलसी की पूजा करनी चाहिए, उसके बाद मनुष्य को भगवान विष्णु का लक्ष्मीजी के साथ पूजन करना चाहिए और अगर हो सके तो आपको भगवान विष्णु के किसी मंदिर में उनकी 108 परिक्रमा भी करनी चाहिए और दिन भर निराहार रहना चाहिए।
शाम को भगवान विष्णु को केले और हलवे का भोग लगाएं, विष्णुजी को पीले वस्त्र चढ़ाएं। लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की पूजा करें। अगले दिन यानी द्वादशी पर किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दें। इसके बाद स्वयं भोजन ग्रहण करें।