रामायण के सुंदरकांड में एक प्रसंग के माध्यम से बड़ी उत्तम और सुंदर सीख हमे दी गयी है। माता सीता की खोज के लिए जब वानरों को भेजा जाता है तो जामवंत, अंगद और हनुमान जैसे कई वानर दक्षिण दिशा की और जाते है।
उसके बाद अथाह सागर को देखकर सब निराशा और हताश हो जाते है। हनुमान जी भी एक कोने में चुपचाप बैठे होते है।
जामवंत कहते है कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूँ वही अंगद कहते है कि मैं जा तो सकता हूं लेकिन आने की कोई गारंटी नहीं है।
यहां सब निराशा की बाते कर रहे थे लेकिन जामवंत ने हनुमान जी को उनका बल याद दिलाया। उन्होंने हनुमानजी को प्रेरित किया और ऐसा करते ही उन्हें उनकी शक्तियां याद हो आयी।
इसके बाद हनुमान जी ने अपने शरीर को पहाड़ जैसा बना लिया और भगवान् राम का कार्य करने के लिए आगे चले।
इस प्रसंग से आप ये सीख सकते है कि इंसान को कभी भी अपने आप को कमजोर नहीं समझना चाहिए। हनुमान जी चुपचाप ऐसे कोने में बैठे थे जैसे वो कुछ नहीं कर सकते।
लेकिन जामवंत जैसे मार्गदर्शक के मिलते ही सब ठीक हुआ। हम बलशाली तो है लेकिन जामवंत जैसा मार्गदर्शक हमारे पास नहीं है।
जामवंत को ढूढ़िये आप स्वयं हनुमान हो जायेगे।