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PM मोदी के साथ सर्वदलीय बैठक के लिए ज्यादातर नेता पहुंचे दिल्ली, फारूक अब्दुल्ला पहुंचेंगे आज

By RNI Hindi Desk 
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रिपोर्ट: सत्यम दुबे

नई दिल्ली: PM मोदी ने जम्मू-कश्मीर के नेताओं को सर्वदलीय बैठक के लिए बुलाया है। लेकिन अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है, कि इस बैठक का मुद्दा क्या रहेगा? मुद्दा तय नहीं होने से इतना तो साफ हो गया है कि बैठक में जो भी मुद्दा होगा, उसका दायरा सीमित नहीं होगा। पीएम मोदी से सब अपने दिल की बात खुलकर करेंगे। बैठक का मुद्दा चाहे जो भी हो, लेकिन इतना तो तय है कि जम्मू-कश्मीर में शांति, स्थिरता, सुरक्षा और विकास के स्थायी वातावरण की बहाली का रोडमैप बन सके और राजनीतिक प्रक्रिया को गति दी जा सके।

बैठक के लिए पीएम के न्योते के बाद बुलाए गए लगभग सभी नेता बुधवार को अपने मुद्दों के साथ दिल्ली पहुंच गए। इनमें पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी शामिल हैं। नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) के अध्यक्ष डा. फारूक अब्दुल्ला गुरुवार को दिल्ली पहुंचेंगे। पीएम के साथ बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी मौजूद रहेंगे।

आपको बता दें कि बैठक के लिए जम्मू कश्मीर के 14 नेताओं को बुलाया गया है। इनमें चार पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला, गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के अलावा चार पूर्व उपमुख्यमंत्री ताराचंद, मुजफ्फर हुसैन बेग, डा. निर्मल सिंह और कवींद्र गुप्ता भी शामिल हैं। इसके साथ ही भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र रैना को भी बुलाया गया है।

जबकि बात करें अन्य नेताओं की तो इस इस बैठक में जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के चेयरमैन सैयद अल्ताफ बुखारी, पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद गनी लोन, प्रदेश कांग्रेस प्रमुख जीए मीर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मा‌र्क्सवादी (माकपा) नेता मोहम्मद युसुफ तारीगामी और पैंथर्स पार्टी के प्रो. भीम सिंह को आमंत्रण भेजा गया है।

आपको बता दें कि 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लागू किए जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के नेताओं की बैठक बुलाई है। इससे केंद्र सरकार ने अलगाववादियों और उनके आका पाकिस्तान को संदेश दिया है कि कश्मीर पूरी तरह से भारत का आंतरिक मुद्दा है और इस पर वह सिर्फ और सिर्फ जम्मू-कश्मीर के उन दलों से बात करेगी, जो भारतीय संविधान में आस्था रखते हुए जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं।

बैठक का एक मायने यह भी निकाला जा सकता है कि उस पुरानी कश्मीर नीति में भी बदलाव की पुष्टि करती है, जिसमें हालात सामान्य बनाने के लिए मुख्यधारा के दलों की उपेक्षा कर अलगाववादियों व उनसे संबधित संगठनों को विश्वास में लेने, उनसे बातचीत की प्रक्रिया को अपनाया जाता रहा है।

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