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मौनी अमावस्या को क्यों किया जाता है संगम में स्नान ? जानिये इसका महत्व

By: RNI Hindi Desk 
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मौनी अमावस्या को क्यों किया जाता है संगम में स्नान ? जानिये इसका महत्व

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वर्ष के 12 माह में माघ माह के देव स्वयं भगवान विष्णु को माना गया है, भगवान विष्णु को इस सृष्टि का पालनकर्ता कहा गया है और वो देवताओं में प्रधान है, माघ माह में पावन नदियों में स्नान, दान और तप का बड़ा धार्मिक महत्व है और इसी माह की अमावस्या को मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है।

प्रयागराज, संगम में ही स्नान क्यों ?

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इस महीने यह अमावस्या 24 जनवरी को पड़ रही है और मान्यता है कि इस दिन तीर्थराज प्रयागराज में संगम स्नान करने से मनुष्य को स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इस दिन संगम में स्नान किया जाता है क्यूंकि स्कंद पुराण के अवंति खंड में समुद्र मंथन की कथा का उल्लेख है।

देवताओं और राक्षसों ने मिलकर समुद्र मंथन किया और 14 रत्नों में से एक अमृत भी निकला, कथा है कि इंद्र के पुत्र जयंत कलश को लेकर भाग गए और इसके बाद दानवों ने देवताओं पर हमला कर दिया और 12 दिनों तक युद्ध हुआ जिसमें अमृत की बुँदे पृथ्वी में 4 स्थानों में पड़ी, जिनमे हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन शामिल है और इसी कारण यह स्थान अति पवित्र कहलाये जाते है और इस दिन यही कारण है कि इस दिन तीर्थराज प्रयाग में करोड़ों लोग स्नान करने आते है।

इसे मौनी अमावस्या क्यों बोला जाता है ?

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इस अमावस्या को मौनी अमावस्या बोला जाता है उसके पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों कारण है, दरअसल इस दिन भगवान सूर्य नारायण और चन्द्रमा दोनों मकर राशि में होते है और यह घटना साल में सिर्फ एक बार होती है, सूर्य को मनुष्य की आत्मा और चन्द्रमा को मन का कारक माना गया है और अमावस्या को चन्द्रमा सबसे कमजोर होता है।

मनुष्य के शरीर में 75 फीसदी पानी है और चन्द्रमा के कारण ही समुद्र में ज्वार भाटा जैसी घटना होती है तो जाहिर है की वो हमारे मन और दिमाग को भी संचालित करता है और यही कारण है कि हमारे धर्म ग्रंथो में इस दिन मौन रहते हुए पूजा पाठ और साधना करने का विधान है ताकि उस दिन आपका मन शांत रहे जो की आपकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए बेहद आवश्यक है।

इस शुभ संयोग में किसी पवित्र नदी में मौन धारण करते हुए डुबकी लगाने का विशेष महत्व होता है और यही कारण है कि इस दिन किसी सामान्य नदी के जल को भी गंगा के जल के समान ही पवित्र माना जाता है।

पितरों का तर्पण इस दिन क्यों ?

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संतों का मत है कि मौन साधना से मिलने वाला पुण्य अक्षय रहता है। संतों के अनुसार मौन व्रत के बगैर मौनी अमावस्या पर स्नान करने से श्रद्धालुओं को पूरा पुण्य नहीं मिलता है, इस दिन माना जाता है कि पितरों का तर्पण करने से पितरों को शांति मिलती है।

इस दिन पितरों का तर्पण करने का विधान इसलिए बनाया गया है क्यूंकि इस तिथि को खुद देवता छद्म वेश धारण करके पृथ्वी पर आते है और इसी दिन आपके पितरों से भी उनका मिलन होता हैं, और यही कारण है कि इस दिन अगर आप अपने पितरों की पूजा करते है तो उनका आशीर्वाद आपको प्राप्त होता है।

अमावस्या के दिन दान में तिल क्यों ?

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अगर दान पुण्य की बात की जाये तो इस दिन दान का बड़ा महत्त्व है, मौनी अमावस्या को ब्राह्मणों को तिल, तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, कम्बल, सर्दी के वस्त्र दान करने का विधान है।

इस दिन काले तिल दान करने का महत्त्व है क्यूंकि सूर्य देव अपने पुत्र शनि की राशि में चन्द्रमा के साथ होते है और मकर राशि का स्वामी शनि इनका शत्रु है, इसलिए शनि देव की शांति के लिए इस दिन काले तिल का दान किया जाता है क्यूंकि शनि का श्याम रंग है। इस दिन काले तिल का दान करने से मनुष्य को शनि देव की कृपा प्राप्त होती है।

संतों का मत है कि मौनी अमावस्या के दिन मां गंगा का ध्यान करते हुए, अपने जल के स्नान में गंगाजल और तिल डाल कर मौन रखते हुए स्नान करें और स्नान-ध्यान के पश्चात किसी मंदिर में जाकर अपनी क्षमता के अनुसार दान करें। 

मौनी अमावस्या को पीपल की ही पूजा क्यों ?

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आपको बता दे कि इस दिन भगवान विष्णु के साथ पीपल के पेड़ की भी पूजा करने का विधान है क्यूंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पीपल के जड़ में भगवान विष्णु, तने में शिवजी तथा अग्रभाग में ब्रह्माजी का वास होता है।

माघ मास के देवता स्वयं भगवान विष्णु है और यही कारण है कि इस दिन पीपल की पूजा करने का नियम है, इसका वैज्ञानिक महत्व भी है और वो यह कि पीपल का पेड़ सदैव ऑक्सीजन देता है जिससे वातावरण शुद्ध रहता है और पीपल के पेड़ की लकड़ी से हवन करने पर भी हवा में मौजूद सभी बुरे कीटाणु और बैक्टीरिया मर जाते है इसलिये पीपल का सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक महत्त्व भी है।

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