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क्यों काटा था मां ने अपना ही मस्तक ? महाविद्या मां छिन्नमस्ता की कहानी

By: RNI Hindi Desk 
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क्यों काटा था मां ने अपना ही मस्तक ? महाविद्या मां छिन्नमस्ता की कहानी

गुप्त नवरात्रों में पूजी जाने वाली 10 महाविधाओं में से हम काली और तारा देवी की बात कर चुके है और आज इस लेख में हम बात करने वाले है माता छिन्नमस्ता की और जानेगे की कैसे माता छिन्नमस्ता अपने भक्तों का कल्याण करती है।

कौन है मां छिन्नमस्ता –

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साधकों के लिए कुंडलिनी जागरण एक ऐसा कार्य है जिसे करना हर किसी के लिए संभव नहीं है, मूलाधार चक्र में जो कुंडलिनी शक्ति का जो मूल रूप है वो छिन्नमस्ता देवी है, देवी स्वयं अपना ही खून पी रही है ठीक उसी प्रकार कुंडलिनी शक्ति शरीर का रक्त पीकर पोषित होती है।

अगर किसी की कुंडलिनी शक्ति जाग्रत हो जाए तो उसे माया प्रभावित नहीं कर सकती और यही कारण है कि माता निर्वस्त्र है, माता के पैरों के नीचे कामदेव और रति है जिन्हे की माया का सबसे बड़ा कारक माना जाता है, स्त्री पुरुष का आकर्षण काम पर आधारित हैं, काम मनुष्य को उत्तम अवस्था और पतित अवस्था दोनों में पहुंचा सकता है और यही कारण है की निर्वस्त्र देवी के चरणों में काम पड़ा हुआ है।

मां को प्रचंड तंत्रिका के रूप में जाना जाता है, मां छिन्नमस्ता चिंताओं का हरण करने वाली हैं। देवी के गले में हड्डियों की माला मौजूद है और कंधे पर यज्ञोपवीत है। देवी छिन्नमस्ता की नाभि में योनि चक्र पाया जाता है।

मां छिन्नमस्ता की कथा –

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छिन्नमस्ता देवी की रूप की चर्चा शिव पुराण और मार्कण्डेय पुराण में भी देखने को मिलता है। देवी चंडी ने राक्षसों का संहार कर देवताओं को विजय दिलायी। माना जाता है कि जहां देवी की पूजा होती है वही शिव की पूजा जरूर होनी चाहिए।

अन्य कथा के अनुसार एक बार देवी अपनी सखियों के साथ स्नान करने गयीं। तालाब में स्नान के बाद उनकी सखियों को भूख लगी। उन्होने देवी से कुछ खाने को कहा। सखियों की इस बात पर देवी ने उन्हें इंतजार करने को कहा। लेकिन सखियों ने उनकी बात नहीं मानी और भोजन के लिए हठ करने लगीं।

तब देवी ने अपने शस्त्र से अपनी गर्दन काट कर तीन धाराएं निकालीं। उनमें से दो से सखियों की प्यास बुझायी और तीसरी से उनकी प्यास बुझी। तभी वह छिन्नमस्ता के नाम से मशहूर हैं। देवी दुष्टों के लिए संहारक और भक्तों के लिए दयालु हैं। 

मां छिन्नमस्ता का मंदिर

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छिन्नमस्ता देवी का मंदिर झारखंड में स्थित है। यह मंदिर असम के कामख्या मंदिर के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। कई विशेषज्ञ का कहना है कि इस मंदिर का निर्माण 6000 वर्ष पहले हुआ था और कई इसे महाभारत कालीन का मंदिर बताते हैं.

रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित यह मंदिर लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा हुआ है। यहां केवल मां छिन्नमस्ता का ही मंदिर नहीं है बल्कि शिव मंदिर, सूर्य मंदिर और बजरंग बली सहित सात मंदिर मौजूद हैं।

मंदिर में कैसा है मां का स्वरुप –

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मंदिर के अंदर जो देवी काली की प्रतिमा है, उसमें उनके दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है. शिलाखंड में मां की तीन आंखें हैं. बायां पैर आगे की ओर बढ़ाए हुए वह कमल पुष्प पर खड़ी हैं.

पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं. मां छिन्नमस्तिका का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है. बिखरे और खुले केश, आभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में दिव्य रूप में हैं. दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है. इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हे वह रक्तपान करवा रही हैं और गले से रक्त की 3 धाराएं निकली हुई है।

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