माघ और आषाढ़ के नवरात्रों को गुप्त नवरात्र इसलिए कहा जाता है क्यूंकि इन 9 दिनों में दुर्गा की साधना गुप्त रूप से की जाती है।
ये नवरात्र भौतिक सुख सुविधाओं के लिए नहीं बल्कि विशेष साधना प्राप्त करने के लिए किये जाते है और यही कारण है कि इन 9 दिनों को गुप्त बोला जाता है यानि की छिपकर।
आपको बता दे कि शिव ने त्रिपुरासुर के वध के लिए शक्ति की उपासना की थी वही भगवान राम ने भी रावण का वध करने के लिए शक्ति को प्रसन्न करने के लिए आराधना की थी।
दूसरी बात यह भी है कि गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है।
तंत्र मन्त्र से जुड़े हुए लोग महीनों तक इन नवरात्रों का इंतज़ार करते है ताकि वो लम्बी और दुर्लभ साधना कर शक्तियों को प्राप्त कर सके।
तारा देवी के बारे में दो कथाएं प्रचलित है, एक कथा के अनुसार वो सती की बहन है, माता सती राजा दक्ष की पुत्री थीं।
राजा दक्ष की और भी पुत्रियां थीं जिसमें से एक का नाम तारा हैं। तारा एक महान देवी हैं, तारने वाली कहने के कारण माता को तारा भी कहा जाता है।
यह गुप्त नवरात्रि की दूसरी शक्ति हैं। आद्य शक्ति हैं। महाविद्या हैं। महादेवी हैं। मां के अमृतमयी दूध की शक्ति हैं।
दरअसल यह संदर्भ दूसरी कथा को दर्शाता हैं, एक बार भगवान विष्णु के कहने पर देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन करने पर सहमति हुई, जिसमे हलाहल विष भी निकला और इसे शिव ने ग्रहण कर लिया।
उसके बाद भी उनके शरीर का दाह रुकने का नाम नही ले रहा था, इसलिये दुर्गा ने तारा मां का रूप लिया और भगवान शिवजी ने शावक का रूप लिया।
फिर तारा देवी उन्हे स्तन से लगाकार उन्हे स्तनों का दूध पिलाने लगी. उस वात्सल्य पूर्ण स्तंनपान से शिवजी का दाह कम हुआ। लेकिन तारा के शरीर पर हलाहल का असर हुआ जिसके कारण वह नीले वर्ण की हो गयी।