यमुना एक्सप्रेस-वे के विकास के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इस फैसले के बाद, अब प्राधिकरण को एक्सप्रेस-वे और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकास के लिए भूमि का अधिग्रहण करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं आएगी।
इस मामले में पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर फैसला सुनाया था। एक फैसले में, हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण को बरकरार रखा था और प्राधिकरण को बढ़े हुए मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दिया था। वहीं दूसरे फैसले में, हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण के लिए राज्य सरकार की कार्रवाई को रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद, मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां अब यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरण को बड़ी राहत मिली है।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की अगुवाई में यमुना एक्सप्रेस-वे के भूमि अधिग्रहण की वैधता को बरकरार रखते हुए प्राधिकरण के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने यह माना कि भूमि अधिग्रहण यमुना एक्सप्रेस-वे के निर्माण और आसपास के क्षेत्रों के विकास के लिए आवश्यक है और यह एकीकृत सार्वजनिक-हित परियोजना का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत लागू किए गए प्रावधानों की वैधता पर भी मुहर लगाई। कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के लिए लगाए गए तत्काल प्रावधान सही थे और इसके तहत की गई कार्रवाई उचित थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी विचार किया कि भूमि अधिग्रहण का उद्देश्य केवल एक्सप्रेस-वे के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ-साथ क्षेत्रीय विकास भी है। कोर्ट ने कहा कि यह योजना सार्वजनिक हित में और सरकार की विकास नीति के अनुरूप है।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकांश प्रभावित भूमि मालिकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित बढ़े हुए मुआवजे को स्वीकार किया है। यह मुआवजा नो लिटिगेशन बोनस के रूप में 64.7 प्रतिशत बढ़ाया गया था, जिसे प्रभावित पक्षों ने स्वीकार किया। इसलिए, कोर्ट ने मुआवजे में और वृद्धि की मांग को अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित
भूमि अधिग्रहण की वैधताः कोर्ट ने यह माना कि यमुना एक्सप्रेस-वे का भूमि अधिग्रहण प्राधिकरण द्वारा शुरू की गई एकीकृत विकास योजना का हिस्सा है और इसके तहत भूमि विकास भी आवश्यक है।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 17 (1) और 17(4): कोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम की ये धारा इस मामले में पूरी तरह से वैध और उचित थी, जिसके तहत भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई को कानूनी मंजूरी मिली।
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो फैसलों का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि कमल शर्मा मामले में लिया गया निर्णय सही था और यह पहले के उदाहरणों पर आधारित था। वहीं, श्योराज सिंह मामले में हाईकोर्ट का निर्णय गलत था और उसे खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यमुना एक्सप्रेस-वे के विकास के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। इससे न केवल एक्सप्रेस-वे का निर्माण तेजी से होगा, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी विकास की गति बढ़ेगी।
इस फैसले के बाद, YEIDA अब बिना किसी कानूनी अड़चन के भूमि अधिग्रहण कर सकेगा और क्षेत्र में विकास कार्यों को और तेज कर सकेगा। साथ ही, प्रभावित किसानों और भूमि मालिकों को मुआवजे के मुद्दे पर भी स्पष्टता मिली है, जिससे भविष्य में किसी तरह के विवाद की संभावना कम हो गई है।
This Post is written by Shreyasi Gupta