वैसे तो साल में 12 पूर्णिमा आती है लेकिन आश्विन माह की पूर्णिमा कुछ खास होती है। दरअसल इस दिन माना जाता है कि चांद से निकलने वाले किरणें अमृत के तरह होती है। मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा वाली रात को खीर बनाकर चांद की रोशनी में पूरी रात रखा जाता है।
शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी संपूर्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है। पूर्णिमा तिथि का स्वामी भी स्वयं चंद्रमा ही है। दरअसल चांद की रोशनी में औषधीय गुण होते हैं जिसमें कई असाध्य रोगों को दूर करने की क्षमता होती है।
शरद पूर्णिमा को खीर को रात भर चांद की रोशनी में रखने के बाद खाने की परम्परा है। रातभर इसे चांदनी में रखने से इसकी तासीर बदलती है और रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। कहा जाता है कि इसे चांदी के बर्तन में रखना चाहिए क्यूंकि चांदी की रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है।
दूसरी और यह भी माना जाता है की इसी दिन समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थी जिसका बाद में श्री विष्णु ने वरण किया था। शरद पूर्णिमा पर यह भी मान्यता है कि देवी लक्ष्मी इस रात को पृथ्वी पर भ्रमण करने आती हैं और हर घर में जाकर देखती हैं कौन-कौन इस रात को जगकर प्रभु का भजन जपता है।
समुद्र मंथन से चौदह रत्नों का प्राप्ति हुई थी। जिसमें लक्ष्मी जी भी एक हैं। ऐसा माना जाता है कि मां लक्ष्मी की उत्पत्ति अश्विन माह की पूर्णिमा तिथि को हुई थी। इसलिए शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा का विशेष प्रावधान माना गया है।
इस दिन रात्रि में प्रत्येक व्यक्ति को कम से कम 30 मिनट तक शरद पूर्णिमा का स्नान करना चाहिए। रात्रि 10 से 12 बजे तक का समय उपयुक्त रहता है। इसके अलावा ऐसा मानते हैं कि इस दिन देवी लक्ष्मी अपनी सवारी उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी का भ्रमण करने आती हैं।