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8 साल की मेहनत के बाद कुरान का हुआ हिंदी अनुवाद, यहां पढ़े पूरी खबर…

हिंदी भाषा में क़ुरआन और इस्लामी लिटरेचर का अनुवाद वक़्त की ज़रुरत अध्यक्ष जमीअत उलमा ए हिन्द और प्रधानाध्यापक दारुल उलूम देवबंद मौलाना सैयद अरशद मदनी का बड़ा कारनामा सामने आया , 8 साल की दिनरात मेहनत के बाद क़ुरआन मजीद का हिंदी ज़बान में अनुवाद पेश किया

By RNI Hindi Desk 
Updated Date

मुमताज़ आलम रिज़वी

नई दिल्ली: वर्तमान में देश की दशा और दिशा जो है उसमे क़ुरआन मजीद और इस्लामी लिटरेचर का हिंदी ज़बान में अनुवाद करना किस प्रकार से आवश्यक है इस सिलसिले में अध्यक्ष जमीअत उलमा ए हिन्द और प्रधानाध्यापक दारुल उलूम देवबंद मौलाना सैयद अरशद मदनी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह समय की मांग है जिसको पूरा करना हमारी ज़िम्मेदारी है। 8 साल की अंथक मेहनत से क़ुरआन मजीद का अनुवाद करने वाले मौलाना मदनी ने कहा कि क़ुरआन के अनुवाद की असल बुनियाद अरबी भी है।

जब हिंदुस्तान के अंदर इस्लाम आया तो यहाँ की ज़बान फ़ारसी थी, तत्कालीन उलिमा ने अपनी आवश्यकता के अनुसार क़ुरआन और इस्लामी लिटरेचर को फ़ारसी ज़बान में अनुवाद किया। और जब फ़ारसी ज़बान अवाम के बीच से रुख़्सत होने लगी तो फिर उलमा ने क़ुरआन और इस्लामी लिटरेचर को फ़ारसी ज़बान से उर्दू ज़बान में अनुवाद किया। बड़े बड़े अनुवाद हज़रत शाह वलीउल्लाह साहब मोहद्दिस के बेटे वगैरह ने किया। इस तारीख़ी सच्चाई को पेश करते हुए मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हम देख रहे हैं उर्दू भाषा भी हिंदुस्तान में अच्छी हालत में नहीं है तो हमने इस काम को ज़रूरी समझा कि हमें हिंदी भाषा में इस्लामी लिटरेचर को बदलना चाहिए। इसी बुनियाद पर हमने क़ुरआन मजीद का हिंदी भाषा में अनुवाद किया है। क्यूंकि मुसलमानों की एक बड़ी आबादी और उनके बच्चे उर्दू भाषा से दूर हो रहे हैं। और स्कूलों के अंदर हिंदी भाषा को ही पढ़ते हैं। इसलिए हमारे दिमाग़ में यह विचार आया कि  जो बच्चे उर्दू भाषा से बिल्कुल अज्ञान हैं तो उनको किस प्रकार से अपना मज़हब सिखाएं? यह एक सवाल भी है और मिल्लत का अहम मसला भी। इसलिए हमने सोचा कि क़ुरआन के अनुवाद को भी हिंदी भाषा में बदल देना चाहिए। अल्लाह का शुक्र है की आठ साल के मुसलसल प्रयास से क़ुरआन अब हिंदी भाषा में भी बदल गया है।

मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि दूसरी बात यह है कि नए नए चैलेंजेज और क़ुरआन की आयात के ऊपर तरह तरह एतराज़ात इस वक़्त हमारे सामने आये जो उस वक़्त नहीं थे। तो हमने क़ुरआनी आयात के इस सिलसिले में जो सही रुख था उसको अपनाया ताकि एतराजात अपनी जगह क़ायम न रह सकें। इन एतराज़ात के जवाबात में हमने इस अनुवाद के अंदर दिए हैं।

मौलाना मदनी ने कहा कि अगर कोई आदमी ग़ौर करेगा तो यह चीज़ें उसको इसके अंदर मिलेंगी। इस अनुवाद की हमारी असल बुनियाद नव्वे फ़ीसद हज़रत शैख़ुल हिन्द का अनुवाद और सारांश है। लेकिन हमने इस एतबार से कि उर्दू ज़बान दायीं जानिब से लिखी जाती है , अनुवाद शैख़ुल हिन्द का गौरव है कि हर अरबी शब्द के नीचे उसका अनुवाद आ गया है और इसके साथ साथ जो शब्द प्रयोग किये गए हैं वह भी आसान हैं। लेकिन हिंदी ज़बान में यह मुमकिन नहीं था। क्यूंकि हिंदी भाषा बायीं तरफ़ से लिखी जाती है। हर शब्द के नीचे उसका अनुवाद नहीं आ सकता था। हमने इस कारण हिंदी ज़बान में आज के एतबार से वाक्यों की जो तरतीब होनी चाहिए थी उस तरतीब का ख़्याल रखा है। और 10 फ़ीसद अनुवाद के लिए हज़रत थानवी के अनुवाद को अपनाया है।

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