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ह्रदय रोगी के लिए अमृत के समान है अर्जुन की छाल: जानिये इसका महत्त्व

By RNI Hindi Desk 
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कहते है, दिल हमारे शरीर का सबसे जरुरी हिस्सा है लेकिन क्या हो जब ये दिल ही धड़कना बंद कर दे या बहुत धीरे धीरे धड़कनें लगे, जब आपका दिल सामान्य अवस्था में नहीं धड़क कर धीरे धीरे और असामान्य तरीके से धड़कता है उस अवस्था को हार्ट में ब्लॉकेज होना कहते है और यह एक बेहद ही गंभीर बीमारी है।

वैसे तो यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन 30 साल की उम्र के बाद इसका ख़तरा बढ़ जाता है और लोग इस बीमारी से बहुत घबराते है क्योंकि इसके इलाज़ में बहुत पैसा खर्च हो जाता है तो आज लेख में हम आपको बताने वाले है की कैसे अर्जुन की छाल ह्रदय रोग में वरदान है और यह इस बीमारी को जड़ से खत्म करने की ताकत रखती है।

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आम तौर पर देखा गया है कि ह्रदय रोग और हार्ट अटैक के बाद होने वाली समस्याओं में अर्जुन की छाल का उपयोग बहुत लाभकारी और गुणकारी है। मूल रूप से अर्जुन का वृक्ष भारत में नदियों और झरनों के आसपास पाया जाता है। इसका पेड़ 25 से 30 मीटर ऊंचा हो सकता है। अर्जुन की छाल मुलायम और भूरी होती है लेकिन इसके बीच में हरे और लाल रंग के धब्बे भी दिखाई देते हैं।

अर्जुन के पेड़ में कसुआरिनिन नाम का एक रासायनिक घटक मौजूद होता है जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने के लिए बहुत प्रभावी है। गर्म दूध में अर्जुन की छल के पाउडर को मिलाएं और दिन में एक बार इस काढ़े को पियें। यह एक औषधीय वृक्ष है और आयुर्वेद में हृदय रोगों में प्रयुक्त औषधियों में प्रमुख है। अर्जुन का वृक्ष आयुर्वेद में प्राचीन समय से हृदय रोगों के उपचार के लिए प्रयोग किया जाता रहा है। औषधि की तरह, अर्जुन के पेड़ की छाल को चूर्ण, काढा आदि की तरह लिया जाता है।

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औषधीय महत्व में अर्जुन वृक्ष की छाल और फल का अत्यधित उपयोग होता है। अर्जुन की छाल में करीब 20-24% टैनिन पाया जाता है। छाल में बीटा-सिटोस्टिरोल, इलेजिक एसिड, ट्राईहाइड्रोक्सी ट्राईटरपीन, मोनो कार्बोक्सिलिक एसिड, अर्जुनिक एसिड आदि भी पाए जाते हैं। पेड़ की छाल में पोटैशियम, कैल्शियम, मैगनिशियम के तत्व भी पाए जाते हैं। इसकी छाल को उतार लेने पर यह पुनः आ जाती है। इस छाल को उगने के लिए कम से कम दो वर्ष चाहिए। एक पेड़ में यह छाल 3 साल के चक्र में मिलती है।

यह बाहर से सफेद, अंदर से चिकनी, मोटी तथा हल्के गुलाबी रंग की होती है। कई बार इसकी छाल अपने आप निकल कर गिर जाती है। इसका स्वाद कसैला और तीखा होता है तथा गोदने पर इसके अंदर से एक प्रकार का दूध निकलता है। आचार्य बालकृष्ण ने भी इस औषधि के बारे में बहुत रिसर्च किया है और वो बताते है कि 10 से 15 ग्राम ताज़ी अर्जुन की छाल को कूटकर 200 से 300 मिलीलीटर पानी में डालकर उबाले और एक चौथाई पानी जब रह जाए तो उसे छानकर और उसमे दूध मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।

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यदि आपको ताज़ी छाल नहीं मिले तो सूखी छाल का पाउडर बनाकर 5 ग्राम पाउडर को एक से डेढ़ गिलास में पकाये और जब आधा गिलास रह जाए तो उसमे दूध मिलाकर इसका सेवन करे। इससे ह्रदय की शक्ति और कार्यक्षमता बढ़ जाती है। अर्जुन की छाल एक लाभकारी और गुणकारी वृक्ष है और ह्रदय रोगियों के लिए तो रामबाण औषधि है। इसलिए आप ही आप अपने चिकित्सक से उचित परामर्श लेकर इसका सेवन करें।

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