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BJP : झारखंड की जीत और हार का सबक

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स्टोरी – आलोक पाण्डेय, Principal Correspondent { लखनऊ }

झारखंड विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने सोमवार रात तक सभी 81 सीटों के परिणाम घोषित कर दिये हैं और राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा, झामुमो के नेतृत्व में बने झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने 47 सीटें जीत कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया है। झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने 27 दिसंबर को मोरहाबादी मैदान में नयी सरकार के शपथ ग्रहण की घोषणा की है। भाजपा की हार और झामुओ की प्रचंड़ जीत की वजह क्या है?

इसका असर उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव पर पड़ेगा या नही, यदि पड़ेगा तो हार की रथ को किस तरह से रोकना होगा,ये भाजपा के लिए चिंतन और मनन का विषय है। इसमें कोई शक नहीं भाजपा यानि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा। थोड़ा पीछे चलें तो देखेंगे कि झारखंड की तरह भाजपा ने आत्मविश्वास की वजह से हरियाणा में हारने वाले थे लेकिन किसी तरह सरकार बचायी। महाराष्टï्र में भाजपा जीत कर भी हार गयी।

अब झारखंड में सबसे बड़े दल का दर्जा भी इनसे छिन गया। अगली दो अग्निपरीक्षा दिल्ली-बंगाल में दिखा। सीधी बात करें तो वर्ष 2014 के बाद से भाजपा के लिए सबसे मुश्किल भरा दौर है।
सवाल यह उठता है कि आखिर नरेन्द्र मोदी और भाजपा के चाणक्य अमित शाह के चेहरे को दिखाकर भाजपा कब तक चुनाव जीतने की कोशिश करती रहेगी।

झारखंड चुनाव सबक है कि यूपी में भी अति आत्मविश्वास का घोसला छोड़ भाजपा के रणनीतिकारों को जमीनी स्तर पर सोच को रखकर काम करना होगा। क्योंकि, झारखंड के चुनाव में जहां केन्द्रीय स्तर के नेता सिर्फ बड़े स्तर के मुद्दों का बखान करते रहें वहीं, दूसरी तरफ झामुओ-कांग्रेस-राजद के गठबंधन के नेता हेमंत सोरेन ने सिर्फ स्थानीय मुद्दों मसलन गांव में बंद पड़े विद्यालयों को खुलवाने, ताबड़तोड़ खुल रहे अवैध शराब की दुकानें, आदिवासियों की सुरक्षा,किसानों की आत्महत्या सहित कई ऐसे मुद्दों को उठाया जो वहां की जनता के दिलों को भा गया।

यही वजह है कि भाजपा के दिग्गजों को चुनाव में जनता ने पूरी तरह से नकार दिया और सत्ता की कमान हेमंत सोरेन की हाथों में सौंप दिया।

झारखंड के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर चुनाव जीतने का ख्वाब टूटने की एक वजह यह भी है कि वहां के मुख्यमंत्री की घटती लोकप्रियता के बारे में बारंबार कार्यकर्ताओं ने केन्द्रीय नेताओं ने की।

संघ के वरिष्ठ लोगों ने भी बदलते घटनाक्रम की आईना दिखाते रहें लेकिन अति आत्मविश्वास की चश्मा से चुनाव देखने वाले शीर्ष प्रबंधन ने उनकी सारी बातों को नकार दिया और परिणाम…। भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इस हार से भाजपा को सबक लेने की जरूरत है और यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां पर भी केन्द्रीय नेतृत्व को पार्टी में बदलाव करने की जरूरत है क्योंकि यहां भी नेतृत्व मोदी-अमीत शाह के दम पर आगामी चुनाव को निकालने की ख्वाब पाले हुए हैं।

झारखंड विधानसभा चुनाव नतीजों का स्पष्ट संदेश है कि भाजपा ने न सिर्फ अपने मुख्यमंत्री रघुबर दास पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया बल्कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी समय रहते दखल न देकर झामुमो, कांग्रेस, राजद महागठबंधन की जीत का रास्ता साफ करने में ही अपरोक्ष रूप से मदद की।

अपने अति आत्मविश्वास में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने न सिर्फ राज्य भाजपा के तमाम नेताओं की इस बात को अनसुना किया कि मुख्यमंत्री रघुबर दास को आगे करके अगर चुनाव लड़ा जाएगा तो पार्टी जीत नहीं सकेगी। प्रदेश भाजपा के तमाम नेता लगातार दिल्ली में बैठे माननीयों को यह बताते रहें कि मुख्यमंत्री की साख जनता की बीच ठीक नहीं है। चुनाव से पहले पार्टी को इस पर सोचना चाहिए, लेकिन केंद्रीय नेताओं ने इसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया।

राजनतिकारों की मानें तो जनसंघ के जमाने से पार्टी के संघनिष्ठ नेता और मंत्री सरयू राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को झारखंड की राजनीति के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह से अवगत कराया था।

खनन क्षेत्र में खनन माफि या के बढ़ते वर्चस्व का खुलासा भी किया लेकिन हाईकमान ने सरयू राय की बात सुनने की बजाय उन्हें पार्टी के टिकट से ही वंचित कर दिया गया। आत्मसम्मान लिए जीने-मरने वाले सरयू राय ने पार्टी में बगावत कर दी और मुख्यमंत्री रघुबर दास को उनके ही चुनाव क्षेत्र में चुनौती दी और हरा भी दिया।

झारखंड में भाजपा को पूरा विश्वास था कि केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले छह महीने के दौरान जिस तरह तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर कदम उठाए और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे राम मंदिर विवाद के निबटारे के लिए रास्ता बनाया इनसे झारखंड में पार्टी की नैया आसानी से पार लग जाएगी। यही

वजह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत जिनते भी केंद्रीय मंत्री और नेता प्रचार के लिए झारखंड आए सबने अपना पूरा जोर इन्ही राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने पर लगाया। जबकि विपक्षी महागठबंधन ने पूरे चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर ही लड़ा।

सरयू राय द्वारा उठाए गए उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार के मामले, ग्रामीण इलाकों में विलय के नाम पर करीब 16 हजार छोटे स्कूलों की बंदी, गांवों में अंधाधुंध शराब के ठेके खुलवाने, आदिवासियों की जमीन की हिफ ाजत करने वाले सीएनटी और एसपीटी कानून में भाजपा सरकारों द्वारा संशोधन के प्रयास, नोटबंदी से बंद हुए कारोबार और बढ़ी बेरोजगारी, किसानों की आत्महत्या जैसे कई स्थानीय मुद्दों पर ही अपना चुनाव प्रचार केंद्रित रखा।

स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा और राष्ट्रीय मुद्दों को तरजीह देने की वजह से भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। पार्टी का सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के भरोसे रहना और प्रचार के आखिरी दौर तक राज्य के चुनाव में प्रधानमंत्री को झोंक देना। इसे भी विपक्ष ने मुद्दा बनाया।

दूसरी तरफ 14 महीने सत्ता में रहने के बावजूद हेमंत सोरन ने अपने ऊपर कोई दाग नहीं लगने दिया और पूरे पांच साल उन्होंने सदन में और बाहर एक सफ ल विपक्षी नेता की भूमिका निभाई। आदिवासियों के मुद्दों को उन्होंने जमकर उठाया और एक आदिवासी बहुल राज्य में भाजपा द्वारा गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने, पार्टी के आदिवासी नेताओं को हाशिए पर रखने को खूब मुद्दा बनाया।

हेमंत सोरेन ने विपक्ष में रहकर सिर्फ स्थानीय मुद्दों के अलावा आदिवासियों की समस्याओं को उठाया। सभी को लगा कि जो नेता विपक्ष में रहते हुए उनकी समस्याओं के लिए लड़ रहा है वही उनका असली हीरो है।

यही वजह है कि झारखंड की जनता ने भाजपा को उखाड़ कर हेमंत सोरेन को सत्ता का ताज पहना दिया। यूपी सरकार को झारखंड की आत्मविश्वासी सोच से सबक लेने की जरूरत है और भरसक कोशिश करनी होगी कि राष्टï्रीय मसलों के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को कैसे दूर करे। क्योंकि सत्ता सुख तभी मिलता है जब आप जनता दिलों में राज राज करेंगे…

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