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जुड़वा बच्चों के रहस्यों से उठा पर्दा? आखिर क्यों पैदा होते हैं जुड़वा बच्चे, पढ़े पूरी खबर

जुड़वा बच्चों को लेकर अक्सर आपने लोगों को कहता सुना होगा कि ये ईश्वर की देन है, प्रभु ने दिया है। वहीं कई लोग कहते हैं ये प्रकृति के कारण है या कुछ लोगों का मानना होता हैं कि जुड़वा बच्चे खान-पान में एहतियात न बरतने या किसी प्रोटीन या किसी कैल्शियम को लेकर होता है। लेकिन अब इन सभी रहस्यों से पर्दा उठ गया है। जिसकी जानकारी एक वैज्ञानिक शोध में सामने आई है।

By Amit ranjan 
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नई दिल्ली :  जुड़वा बच्चों को लेकर अक्सर आपने लोगों को कहता सुना होगा कि ये ईश्वर की देन है, प्रभु ने दिया है। वहीं कई लोग कहते हैं ये प्रकृति के कारण है या कुछ लोगों का मानना होता हैं कि जुड़वा बच्चे खान-पान में एहतियात न बरतने या किसी प्रोटीन या किसी कैल्शियम को लेकर होता है। लेकिन अब इन सभी रहस्यों से पर्दा उठ गया है। जिसकी जानकारी एक वैज्ञानिक शोध में सामने आई है।

आपको बता दें कि इसे लेकर वैज्ञानिक लगातार पिछले कई समयों से शोध कर रहे हैं। जिसमें कई बिंदु है, जैसे जुड़वा बच्चों के होने का कारण, कुछ जुड़वां बच्चे एक जैसे क्यों पैदा होते हैं। जबकि कुछ जुड़वा बच्चों का शक्ल अलग-अलग होता है। दावा किया जा रहा है कि इन सभी सवालों की गुत्थी सुलझा ली गई है। यानी ये पता लगा लिया गया है कि जुड़वां बच्चे क्यों होते हैं।

लंबे समय से ये माना जाता है कि जुड़वां बच्चे इत्तेफाक से होते हैं यानी इसके लिए किसी तरह की कोई योजना नहीं बनानी होती है। लेकिन जो शोध सामने आई है, उसने इन सभी कयासों को खारिज किया है। एम्स्टर्डम में व्रीजे यूनिवर्सिटिट (Vrije Universiteit in Amsterdam) के शोधकर्ताओं का दावा है कि इसका ताल्लुक डीएनए से है, जो गर्भधारण से लेकर एडल्टहुड तक बना रहता है। रिसर्च में पाया गया कि लगभग 12 प्रतिशत गर्भधारण ‘मल्टीपल’ होते हैं यानी कि जुड़वां बच्चों के चांस होते हैं लेकिन केवल 2 प्रतिशत मामलों में ही जुड़वां बच्चों कि डिलीवरी हो पाती है। ऐसी स्थिति को ‘वैनिशिंग ट्विन सिंड्रोम’ कहा जाता है।

अब तक ऐसा माना जाता था कि एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चे होना इत्तेफाक भर है लेकिन अध्ययन में पाया गया कि यह इत्तेफाक नहीं होता बल्कि उनके डीएनए पर निर्भर होता है। स्टडी के लेखकों का कहना है कि डीएनए से पता लगाया जा सकता है कि क्या एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चे होंगे। हालांकि वैज्ञानिक यह नहीं पता लगा पाए हैं कि सामान्य तौर पर ऐसे डीएनए की पहचान कैसे की जा सकती है इसलिए अभी इस मामले में और रिसर्च बाकी है। यह भी पता लगाया जाना है कि ये डीएनए माता-पिता से विरासत में मिलने वाला है या एग स्प्लिट के दौरान ऐसा होता है।

शोधकर्ताओं ने एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चों के जीनोम में 834 पॉइंट्स की खोज की। ये बच्चे फर्टिलाइज्ड एग के दो भ्रूण (Embryos) में विभाजित होने के बाद पैदा हुए थे। रिसर्च में यह भी सामने आया कि जुड़वां बच्चों के जेनेटिक मार्कर के प्रमाण जन्मजात रोगों के इलाज में मदद कर सकते हैं। मार्कर्स को खोजने के लिए टीम ने ब्लड और चीक सेल के नमूने लिए और 3,000 से ज्यादा एक जैसे दिखने वाले जुड़वां बच्चों के डीएनए को स्कैन किया।

इस स्टडी में यह भी सामने आया कि आईवीएफ और कृत्रिम गर्भाधान में बढ़ोतरी के कारण प्रत्येक 42 बच्चों में से एक अब जुड़वां बच्चा पैदा हो रहा है। स्टडी के मुताबिक पहले से कहीं ज्यादा जुड़वां पैदा हो रहे हैं। 1980 के दशक के बाद से प्रति 1,000 प्रेगनेंसी पर जुड़वां बच्चों की दर 9 से 12 तक पहुंचने के साथ एक तिहाई तक बढ़ गई है। इसका मतलब है कि दुनियाभर में हर साल लगभग 1.6 मिलियन जुड़वां पैदा होते हैं। इसका एक बड़ा कारण इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF), ओवेरियन सिमुलेशन और कृत्रिम गर्भाधान सहित एमएआर में बढ़ोतरी है। ज्यादा जुड़वां बच्चे होने का एक अन्य कारण पिछले दशकों में कई देशों में महिलाओं के प्रेग्नेंट होने में देरी भी है।

स्टडी के मुताबिक उम्र के साथ-साथ जुड़वां बच्चे होने की संभावना भी बढ़ती जाती है। मीनोपॉज (Menopause) के करीब महिलाओं को हार्मोनल चेंजेस का अनुभव होता है, जो उनके शरीर को ओव्यूलेशन के दौरान एक से अधिक अंडे देने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि दुनिया में सभी जुड़वां बच्चों में से लगभग 80 प्रतिशत अब एशिया और अफ्रीका में होते हैं। यूके में प्रति 1,000 डिलीवरी पर 15 से 17 जुड़वां बच्चे हो रहे हैं।

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