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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से मांगी कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निरीक्षण की अनुमती

उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई, और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की पिछली रिपोर्ट के संदर्भ में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राज्य के अधिकारियों को वन और वन्य जीवन के लिए कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का निरीक्षण करने और 9 नवंबर तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

By RNI Hindi Desk 
Updated Date

रिपोर्ट: अनुष्का सिंह

देहरादून: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई, और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की पिछली रिपोर्ट के संदर्भ में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और राज्य के अधिकारियों को वन और वन्य जीवन के लिए कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का निरीक्षण करने और 9 नवंबर तक की गई कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

वकील और वन्यजीव कार्यकर्ता गौरव बंसल ने कहा कि एनटीसीए को पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने टाइगर रिजर्व में अवैध निर्माण, पेड़ों की कटाई और संपर्क सड़कों के निर्माण के संबंध में उनकी याचिका में की गई शिकायतों पर गौर करने का आदेश दिया था। बंसल ने कहा कि एनटीसीए द्वारा गठित समिति ने 22 अक्टूबर को अपनी रिपोर्ट सौंपी, पैनल ने इस संभावना को दिखलाया कि सीटीआर में सड़कों और भवनों के अवैध निर्माण की अनुमति देने के लिए वन अधिकारियों के सरकारी रिकॉर्ड जाली हो सकते हैं।

समिति ने सीटीआर में अवैध निर्माण को “प्रशासनिक और प्रबंधकीय विफलता” का एक उदाहरण बताया, उत्तराखंड के वन अधिकारियों के खिलाफ सतर्कता जांच की सिफारिश की और साथ ही केंद्रीय मंत्रालय को दोषी वन अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की सिफारिश की।

बंसल ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार एनटीसीए समिति की मुख्य खोज,  सीटीआर में बिना किसी अनुमती के और वित्तीय प्रतिबंधों के बिना अवैध निर्माण, रिजर्व के अंदर कॉटेज बनाने के बजाय “अवैध” भवनों के निर्माण की अनुमति थी।

जिसके बाद एनटीसीए समिति ने बताया कि ये सभी कार्य भारतीय वन अधिनियम 1927, वन्यजीव अधिनियम 1971 और वन अधिनियम 1980 के उल्लंघन में थे”,  साथ ही समिति ने अपने सामने पेश किए गए दस्तावेजों के जाचँ की भी मांग की क्योंकि  उनके मुताबिक वे जाली प्रतीत होते हैं और अवैध निर्माण को तत्काल गिराने की सिफारिश की। और साथ ही यह भी कहा है कि सीटीआर में काटे गए पेड़ों की सही संख्या का पता लगाने के लिए राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के वन सर्वेक्षण को रिमोट सेंसिंग करना चाहिए।

बता दे कि सितंबर में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गयी केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और केंद्रीय मंत्रालय से पखराउ टाइगर सफारी के लिए पेड़ों की अवैध कटाई, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में हुऐ अवैध निर्माण और जल निकाय के आरोपों पर भी जवाब मांगा है।

पैनल से संपर्क करने वाले बंसल ने कहा कि उनकी शिकायत सीटीआर में पखराउ टाइगर सफारी की स्थापना के नाम पर हजारों पेड़ों की कटाई की ओर इशारा करती है। आगे बंसल ने कहा कि कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में गुज्जर सोत, पखराउ ब्लॉक, सोनानदी रेंज, कालागढ़ डिवीजन में एक टाइगर सफारी विकसित की जा रही है। साथ ही बंसल का कहना है कि केंद्रीय मंत्रालय की वन सलाहकार समिति ने पहले उत्तराखंड के वन अधिकारियों के लिखित आश्वासन के बाद ही प्रस्ताव की सिफारिश की थी कि टाइगर सफारी की स्थापना के लिए केवल 163 पेड ही काटे जाएंगे। “इसके विपरीत, वन विभाग के अधिकारियों ने पखराउ टाइगर सफारी की स्थापना के नाम पर हजारों पेड़ उखाड़ दिए हैं और वह भी कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के भीतर, जो देश के सबसे अच्छे और सबसे पुराने राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है। यह न केवल राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए), केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) और वन सलाहकार समिति (एफएसी) द्वारा दी गई वैधानिक मंजूरी के खिलाफ है, बल्कि 2001 के एससी आदेश की भी अवमानना ​​है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि राज्य या किसी अन्य द्वारा न ही कोई पेड़ और न ही कुछ और टाइगर रिजर्व में गिराया जाएगा।”

 

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