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Mahashivratri 2021 : देवभूमि के वो मंदिर, जहां भगवान शिव साक्षात हैं मौजूद

By RNI Hindi Desk 
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रिपोर्ट- पल्लवी त्रिपाठी

आज पूरा देश महाशिवरात्रि मना रहा है । हर जगह शिवभक्त भोले शंकर के प्रतीक शिवलिंग पर भांग, धतूरा और दूध अर्पित कर रहे हैं । महाशिवरात्रि पर शिव की भूमि कहीं जाने वाली देवभूमि उत्तराखंड में अलग ही रौनक रहती है । आपको बता दें कि उत्तराखंड को यूं ही शिव की भूमि नहीं कहा जाता है । दरअसल, उत्तराखंड के कण- कण में शिव का वास है, इसीलिए उत्तराखंड को देवभूमि के रूप में जाना जाता है । उत्तराखंड में जटाधारी शिव के कई प्राचीन मंदिर हैं, जिनका काफी महत्व हैं । माना जाता है कि शिवशंकर यहां स्वयं विराजमान हैं ।

गढ़वाल मण्डल में मौजूद 12 प्राचीन शिव मंदिर

1. एकेश्वर सिद्धपीठ यह सिद्धपीठ भगवान शिव को समर्पित विख्यात और महत्वपूर्ण सिद्धपीठों में से एक है । मंदिर परिसर में भगवान शिव भैरवनाथ जी के रूप में स्थापित हैं । जिन्हें एकेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है । वहीं, स्थानीय भाषा में एकेश्वर महादेव को ‘इगासर महादेव’ कहते हैं ।

2-केदारनाथ केदारनाथ धाम महादेव के धामों में से एक है । यह मन्दाकिनी नदी के किनारे समुद्र तट से लगभग 3584 मी. की ऊंचाई पर स्थित है । बता दें कि केदारनाथ धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है ।

3-मदमहेश्वर – यह मंदिर ऊखीमठ से 30 किमी0 दूर समुद्र तल से 9700 फीट की ऊंचाई पर स्थित है । पंचकेदार के नाम से विख्यात भगवान शिव के पाँच पावन धाम में से मदमहेश्वर दूसरा पावन धाम है । महादेव के इस धाम में भगवान शिव की नाभि की पूजा की जाती है।

4-तुंगनाथ – तुंगनाथ का नाम पंच केदारों में तृतीय केदार के रूप में आता हैं । यह धाम चोपता में समुद्र तल से 12070 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मन्दिर में भगवान शिव की भुजाओं की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर के निकट ही रावण शिला भी स्थित है । मान्यता है कि लंकापति रावण ने इस शिला पर भगवान शिव की तपस्या की थी ।

5-रूद्रनाथ – चमोली में रूद्रनाथ धाम चतुर्थ केदार के रूप में स्थित है । जहां भगवान शिव के एकानन यानि मुख स्वरूप की पूजा की जाती है। यहां पर भगवान शिव रौद्र का रौद्र रूप देखने को मिलता है । मंदिर तीन तरफ से कुण्डों से घिरा हुआ है।

6-कोटेश्वर महादेव – यह मंदिर टिहरी के विकासखण्ड नरेन्द्रनगर में भागीरथी नदी के तट पर स्थित है। मंदिर में स्वयं भू शिवलिंग है । माना जाता है कि इस मंदिर में आने से संतानहीन दंपत्तियों को भगवान शिव का आशीष मिलता है और उनकी मनोकामना पूर्ण होती है ।

7-काशी विश्वनाथ- काशी विश्वनाथ मंदिर सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन हिंदू मंदिरों में से एक है। भगवान शिव का यह मंदिर उत्तरकाशी जिले में भागीरथी नदी के तट पर स्थित है । जिसे निर्माण लगभग 150 वर्ष पूर्व निर्मित किया गया था ।

8-दक्ष प्रजापति मंदिर – भगवान शिव का यह मंदिर हरिद्वार जिले के उपनगर कनखल में स्थित है । दरअसल, कनखल को भगवान शिव का सुसराल माना जाता है। साथ ही मान्यता है कि भगवान शिव ससुर दक्ष प्रजापति ने इसी स्थान पर यज्ञ किया था ।

9-टिब्बरसैंण शिव मंदिर – इस धाम में महादेव की आध्यात्मिक गुफा में एक प्राकृतिक शिवलिंग बनता है । यहाँ स्थानीय निवासी भगवान शिव लिंग के दर्शन करने आते हैं और गर्मी के मौसम में भगवान शिव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। बाबा बर्फानी की ये गुफा चमोली के अंतिम गांव नीति से सात सौ मीटर की दूरी पर मौजूद है।

10-बिनसर मंदिर – यह मंदिर भी भगवान शिव के विख्यात मंदिरों में से एक है । बिनसर मंदिर में हर साल ‘वैकुण्ड चतुर्दशी’ और कार्तिक पूर्णिमा पर मेले का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि यह मंदिर महाराजा पृथ्वी ने अपने पिता बिन्दु की याद में बनवाया था ।

11-ताड़केश्वर महादेव – ताड़केश्वर महादेव मंदिर टिहरी के लैंसडाउन क्षेत्र में स्थित है । ताड़केश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है । ताड़केश्वर धाम महादेव के सिद्धपीठों में से एक है ।

12-लाखामण्डल शिव मंदिर यह धाम देहरादून से कुछ दूरी पर लाखामंडल में स्थित है। मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में यहां पांडवों को जलाकर मारने के लिए दुर्योधन ने लाक्षागृह बनाया था। अज्ञातवास के दौरान युधिष्ठर ने इसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी । जो मंदिर में आज भी मौजूद है। मौजूद शिवलिंग को महामुडेश्वर के नाम से जाना जाता है।

कुमाऊँ मण्डल में मौजूद 12 प्राचीन शिव मंदिर

1-जागेश्वर महादेव – भगवान शिव का यह धाम अल्मोड़ा से 38 कि.मी की दूरी पर स्थित है । लिंग पुराण के अनुसार, जागेश्वर संसार के पालनहार भगवन विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है।

2-बिनसर महादेव मंदिर – बिनसर महादेव मंदिर अपने पुरातात्विक महत्व और वनस्पति के लिये लोकप्रिय है। यह मंदिर रानीखेत से लगभग 20 किमी0 की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 10वीं सदी में किया गया था ।

3-कपिलेश्वर मंदिर – अल्मोड़ा नगर से लगभग 12 किमी दक्षिण पूर्व में सिमल्टी नामक गांव के निकट शिव मंदिर कपिलेश्वर स्थित है । इसकी ऊंचाई लगभग 37 फिट है। इस मंदिर की अलंकृत रचनाऐं लोगों का मन मोह लेती हैं ।

4-पाताल भुवनेश्वर- पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट में स्थित पाताल भुवनेश्वर गुफा में यह धाम है। स्कंध पुराण के अनुसार, पाताल भुवनेश्वर की गुफा के सामने पत्थरों से बना एक-एक शिल्प तमाम रहस्यों को खुद में समेटे हुए हैं। इस गुफा में पानी की धारा लगातार शिवलिंग का अभिषेक करती रहती है ।

5- थलकेदार मंदिर – यह धाम थलकेदार पहाड़ी के शिखर पर समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर परिसर में स्थापित शिवलिंग सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसे हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी गयी हर मनोकामना पूरी होती है।

6-बागनाथ मंदिर- भगवान शिव के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है, जो ब्याघ्रेश्वर या बागनाथ के नाम से जाना जाता है । यह उत्तराखंड की काशी के नाम से प्रसिद्ध है।

7-क्रान्तेश्वर महादेव- चम्पावत नगर के पूर्व में स्थित कूर्म पर्वत के शिखर पर क्रान्तेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। क्रान्तेश्वर महादेव मंदिर को स्थानीय लोग कणदेव एवं कुरमापद नाम से सम्बोधित करते है।

8-ऋषेश्वर महादेव – भगवान शिव का यह मंदिर लोहावती नदी के तट पर अवस्थित हैं । ऋषेश्वर महादेव मंदिर लोहाघाट के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है । ऋषेश्वर महादेव के दर्शन के बिना लौटने पर लोहाघाट की यात्रा अधूरी मानी जाती है।

9-सिद्ध नरसिंह मंदिर – यह मंदिर समुद्र सतह से 2050 मीटर ऊंचाई पर स्थित है । मंदिर परिसर बांज के घने पेड़ों से घिरा है । जहां सिद्ध नरसिंह मंदिर के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं ।

10-भीमेश्वर महादेव- नैनीताल के भीमताल में भीमेश्वर महादेव मंदिर पौराणिक काल से भीमताल झील के किनारे स्थापित है । यह नैनीताल नगर से २२ किमी0 दूर स्थित है । ऐसी मान्यता है कि यह मंदिर पाण्डवों द्वारा स्थापित किया गया था ।

11-मुक्तेश्वर महादेव- महादेव का यह धाम नैनीताल के मुक्तेश्वर पहाड़ी पर मुक्तेश्वर महादेव मंदिर पौराणिक काल से स्थापित है । जो नैनीताल नगर से 52 किमी0 की दूरी पर स्थित है ।

12-मोटेश्वर महादेव- इस मंदिर में भगवान शिव के बारहवां उप ज्योतिर्लिंग स्थापित है । शिवलिंग की मोटाई अधिक होने के कारण यह मोटेश्वर महादेव मन्दिर के नाम से विख्यात हैं । माना जाता है कि जो भक्त कावड़ लेकर यहां पहुंचता हैं, उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है ।

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