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नामांकन निरस्त होने के बावजूद भी कैसे पीएम के बेहद करीबी बन गए अनिल बलूनी, पढ़े पूरी खबर

By RNI Hindi Desk 
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उत्तराखंड : उत्तराखंड में राजनीतिक हलचल मची हुई है । प्रदेश के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया है । इसी के साथ बीजेपी ने मुख्यमंत्री के तौर पर उत्तराखंड में कार्यकाल पूरा न करने का अपना रिकॅार्ड कायम रखा । हालांकि, अब लोगों के मन में सवाल है कि उत्तराखंड का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा ? तो बता दें कि मुख्यमंत्री पद के लिए दो नाम सामने आ रहे हैं । पहले अनिल बलूनी और दूसरे धन सिंह । यहीं वो दो नाम हैं, जिनमें से कोई एक मुख्यमंत्री का पदभार संभाल सकता है ।

वहीं, बात करें मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अनिल बलूनी के राजनीतिक सफर की । भाजपा नेता अनिल बलूनी उत्तराखंड से राज्यसभा और बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी हैं । उन्होंने उत्तराखंड की सर जमीन से ही सियासत सीखी है । बलूनी को शांत और गंभीर स्वभाव के शख्स के रूप में जाना जाता है । अनिल बलूनी को पीएम मोदी और अमित शाह के करीबी कहा जाता हैं । अनिल उत्तराखंड के लोगों की नब्ज टटोलने में माहिर हैं, जिसके चलते माना जा रहा है कि पार्टी सीएम के तौर पर उनका चुनाव कर सकती है । क्या आप जानते हैं कि अनिल बलूनी एक समय पर पत्रकार रह चुके हैं ।

अनिल ने युवावस्था में जर्नलिज्म की पढ़ाई की थी । उस वक्त से ही अनिल राजनीति में काफी एक्टिव थे । वह दिल्ली संघ परिवार के दफ्तरों के आसपास घूमा करते थे । जिसके बाद उनकी दोस्ती संघ के जाने-माने नेता सुंदर सिंह भंडारी से हो गयी थी । जब सुंदर सिंह भंडारी बिहार के राज्यपाल बनें, तो उन्होंने अनिल बलूनी को अपना ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (OSD) चुना था । इसके बाद जब सुंदर को गुजरात का राज्यपाल बनाया गया तो भी उन्होंने बलूनी का साथ नहीं छोड़ा ।

बता दें कि वे पहले भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के प्रदेश महामंत्री रह चुके हैं । फिर निशंक सरकार में वन्यजीव बोर्ड में उपाध्यक्ष, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और फिर राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख बने । आपको बताते चलें कि अनिल ने साल 2002 में उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में कोटद्वार सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी की थी । हालांकि, उनका नामांकन निरस्त कर दिया गया था । इस बात पर नाराजगी जाहिर करते हुए बलूनी कोर्ट पहुंच गए थे । जहां से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर साल 2004 में उन्होंने कोटद्वार से उपचुनाव लड़ा । लेकिन वो चुनाव हार गए थे । हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और आज वो इस मुकाम पर पहुंच गए है कि अनिल मुख्यमंत्री की कुर्सी से कुछ ही दूर हैं ।

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