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काशी में दिखी अजब आस्था: लोलार्क कुंड जाने से रोका तो गंगा घाट पर निभाई परंपरा

By RNI Hindi Desk 
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सूर्य (लोलार्क) षष्ठी पर पुत्र प्राप्ति की कामना लिए दूर-दराज से भदैनी स्थित लोलार्क कुंड में स्नान करने पहुंचे सैकड़ों दंपती कुंड तक नहीं पहुंच सके। ऐसे लोगों का आसरा अस्सी का गंगा तट बना। कोरोना संक्रमण के मद्देनजर लगे प्रतिबंध के कारण वे सोमवार भोर में लोलार्क कुंड में स्नान नहीं कर सके।
ऐसे लोगों ने अस्सी घाट पर गंगा में स्नान किया। वहीं मनौती मानी। जिनकी मनौती पूरी हो गई, उन्होंने घाट पर ही क्षौर आदि कर्मकांडों की परंपरा निभाई। यह सब सुबह लगभग छह बजे तक ही चला। इसके बाद पुलिस ने दंपतियों को अस्सी घाट जाने से रोक दिया। लोगों को क्रीं कुंड भी जाने को नहीं मिला क्योंकि वहां भी पुलिस तैनात थी।

बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के लोग सैकड़ों किलोमीटर का सफर करके रविवार रात ही काशी पहुंच गए थे। मगर लोलार्क कुंड पर स्नान पर प्रतिबंध की जानकारी ने उन्हें निराश कर दिया। ये लोग सूर्योदय से पूर्व ही अस्सी घाट पर गंगा में स्नान किया। न्यू अस्सी घाट से चौराहे तक सिर्फ लोग ही लोग नजर आ रहे थे। इसी भीड़ में सड़क के किनारे कुछ परिवार भोग की सामग्री पकाने के लिए ईंटों का चूल्हा जलाए बैठे थे।

मनौती उतारने के लिए बहुत सारे लोग बच्चों का मुंडन भी कराते दिखे। भोर के तीन बजे से लेकर करीब साढ़े पांच बजे तक पहुंचने वालों ने तो मनौती उतार ली लेकिन इसके बाद पहुंचने वाले लोग अस्सी तिराहे से आगे नहीं बढ़ पाए।

पुलिस ने काफी मशक्कत के बाद अस्सी घाट से तिराहे के बीच का हिस्सा भीड़ से खाली कराया। भीड़ को लोलार्क कुंड की ओर जाने से रोकने के लिए शिवाला और रवींद्रपुरी मोड़ के पास से भी रास्ता कुछ देर बंद कर देना पड़ा। सुबह नौ बजे तक लोगों के आने का क्रम जारी रहा। उल्लेखनीय है कि दो दिन पूर्व से ही लोलार्क कुंड में स्नान पर प्रतिबंध की सूचना प्रसारित होने से बनारस और समीपवर्ती जिलों की भीड़ नहीं आई।

पुत्र रत्न की प्राप्ति की लालसा खींच लाती है लोलार्क कुंड

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को सूर्य षष्ठी और लोलार्क षष्ठी के नाम से जाना जाता है। लोलार्क षष्ठी को ललई छठ भी कहा जाता है। आज के दिन लोलार्क षष्ठी (ललई छठ) पर वाराणसी स्थित लोलार्क कुंड पर स्नान करने का विधान है। मान्यता है कि स्नान से नि:संतान दम्पत्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। इस कुंड में स्नान कर अनेक दंपतियों ने पुत्र सुख पाया है। इस मान्यता के चलते हर साल लोलार्क छठ पर इस कुंड में डुबकी लगाने वालों की भारी भीड़ होती है। इस कुंड में स्नान करने वाले नि:संतान दम्पत्ति स्नान के बाद कपड़े कुंड में ही छोड़ देते हैं। इस दौरान महिलाएं श्रृंगार आदि की सामग्री भी वहीं छोड़ती हैं।

इसलिए नाम पड़ा लोलार्क

शिव भक्त विद्युन्माली दैत्य को जब सूर्य ने हरा दिया, तब सूर्य पर क्रोधित हो भगवान रुद्र त्रिशूल हाथ में लेकर उनकी ओर दौड़े। उस समय सूर्य भागते-भागते पृथ्वी पर काशी में आकर गिरे, इसी से वहां उनका लोलार्क नाम पड़ा।

 

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