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दिवालिया हो चुकी इस कंपनी को खरीदने के लिए मुकेश अंबानी ने दिखाई दिलचस्पी

Mukesh Ambani showed interest to buy this bankrupt company; मुकेश अंबानी दिवालिया हो चुकी सिंटेक्स कंपनी को खरीदने दिखाई दिलचस्पी। एसेट्स केयर एंड रिकंस्ट्रक्शन के साथ पार्टनरशिप में दिया।

By RNI Hindi Desk 
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नई दिल्ली: मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज देश में तेजी से अपने कारोबार को सभी सेक्टर में बढ़ाने में लगी है। ऐसे में कोई भी मौका गंवाना नहीं चाहता है। मुकेश अंबानी अब दिवालिया हो चुकी सिंटेक्स कंपनी को खरीदने के लिए एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट दिया है। सिंटेक्स को खरीदने के लिए रिलायंस  ने एसेट्स केयर एंड रिकंस्ट्रक्शन के साथ पार्टनरशिप में दिया है।

इसके अलावा सिटेंक्स को खरीदने की दौड़ में आदित्य बिड़ला एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी के इनवेस्टमेंट वाली वार्ड कैपिटल, वेलस्पन ग्रुप की एक कंपनी, इडलवाइज ऑल्टनेटिव एसेट्स एडवाइजर्स, ट्राइडेंट लिमिटेड और इंडोकाउंट इंडस्ट्रीज भी शामिल हैं।

फैब्रिक बिजनेस से जुड़ी सिंटेक्स में एरेस एसएसजी कैपिटल की बड़ी हिस्सेदारी है। सिंटेक्स इंडस्ट्रीज की वेबसाइट के मुताबिक कंपनी अरमानी, ह्यूगो बॉस, डीजल और बरबेरी जैसे जैसे वैश्विक फैशन ब्रांडों को कपड़े मुहैया कराती है।

सिंटेक्स कंपनी हो चुकी है दिवालिया

दरअसल सिंटेक्स इंडस्ट्रीज कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी एंड रिजॉल्यूशन प्रोसेस से गुजर रही है। सिंटेक्स इंडस्ट्रीज के खिलाफ इस साल अप्रैल में एनसीएलटी  की अहमदाबाद ब्रांच में इनसॉल्वेंसी प्रोसेस शुरू हुई थी। कंपनी सितंबर 2019 में इनवेस्को एसेट मैनेजमेंट (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड का 15.4 करोड़ रुपये का पेमेंट करने में नाकाम रही थी। कंपनी के रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल ने 27 फाइनेंशियल क्रेडिटर्स का 7,534.6 करोड़ रुपये का दावा स्वीकार किया है।

सिंटेक्स इंडस्ट्रीज पर एचडीएफसी बैंक, एक्सिस बैंक, आरबीएल, आदित्य बिड़ला फाइनेंस, इंडसइंड बैंक, जीवन बीमा निगम और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का कर्ज है। जबकि पंजाब नेशनल बैंक, पंजाब एंड सिंध बैंक और कर्नाटक बैंक ने कंपनी के अकाउंट को फ्रॉड घोषित किया है।

साल 2017 में सिंटेक्स प्लास्टिक्स टेक्नोलॉजी को सिंटेक्स इंडस्ट्रीज से अलग किया गया था. सिंटेक्स प्लास्टिक्स टेक्नोलॉजी वाटर स्टोरेज टैंक बनाती है।

इससे पहले रिलायंस इंडस्ट्रीज ने जेएम फाइनेंशियल एआरसी के साथ मिलकर आलोक इंडस्ट्रीज के लिए बोली लगाई थी और बाद में उसका अधिग्रहण किया था। यह एकमात्र मौका था, जब रिलायंस ने किसी दिवालिया कंपनी के लिए बोली लगाई थी।

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