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सबसे भयानक गरीबी अकेलापन है: मदर टेरेसा

By RNI Hindi Desk 
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वैसे तो आज उस शख्सियत का जन्मदिन है जिसने दुनिया को संत शब्द का मतलब अच्छे से समझाया, वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में भी और भूतकाल के भी। भविष्य की बात तो देखी किसने है, लेकिन हां भूतकाल के साथ वर्तमान भी अगर हम अच्छा बनाकर चल रहे हैं। तो निश्चित ही भविष्य अच्छा बना सकते हैं। बात संत की चल रही है उस संत की जो शां‍ति की दूत और मानवता की प्रतिमूर्ति थी, है और रहेगी। आमतौर पर संत का मतलब लोग दुनियादारी से दूर मानते हैं, यानि किसी से ‘कुछ लेना न देना मगन रहना’ वाली बात हो जिसमें। कहते भी हैं अक्सर बड़ा संत आदमी है, किसी को कुछ नहीं कहता। लेकिन इसका जो अंग्रेजी शब्द है, सेंट, उसके पीछे की कहानी और इस शब्द का मतलब बहुत अलग है। बात मदर टेरेसा की कर रहे हैं, जिनका जन्मदिन है आज। उन्हें संत भी कहा जाता है। वो एक ऐसी शख्सियत थी,जिन्होंने धर्म को बांटा नहीं,हां… धर्म को समेटकर किसी दूसरे का भला जरूर किया, हर बार किया, बार-बार किया,ता-उम्र किया। एक आम महिला से मदर टेरेसा संत टेरेसा कैसे बनी,वो जानिये। 26 अगस्त 1910 में अल्बेनिया के स्काप्जे में जन्मीं गोंझा बोयाजिजू आम जिंदगी ही जी रही थीं। वैसे अल्बेनियई जुबान में गोंझा का मतलब कली होता है। सो ये कली भी अपनी प्यारी सी जिंदगी में खिल-खिला रही थी, लेकिन अचानक उनकी जिंदगी बदल जाती है वो भी महज 8 साल की उम्र में। जब उनके पिता का साया उनके सिर से उठ जाता है। मां को 5 बच्चों की परवरिश करनी थी। लिहाजा गोंझा भी अपनी मां का दर्द समझ रही थीं। कहा जाता है जब वो केवल 12 साल की थीं तभी उन्हें ये महसूस हो चुका था कि वो अब और कुछ नहीं केवल मानव सेवा करेंगी। महसूस हुआ तो फैसला भी लिया और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 18 साल की उम्र में उन्होंने सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो में शामिल होने का फैसला ले लिया। इसके बाद सिस्टर टेरेसा 6 जनवरी 1929 को कोलकाता में लोरेटो कान्वेंट पहुंचीं और 1944 में हेडमिस्ट्रेस बनीं। वो दौर दूसरे विश्व युद्ध के साये का था और तब बंगाल का सामना सबसे भयंकर अकाल से था। लाखों लोग भूख से मर गए। म्यांमार पर जापान के हमले के बाद लोग भागकर कोलकाता की सड़कों पर आ गए। लाखों लोग बेघर हो गए और साथ ही बे-पेट भूखे भी रह रहे थे। ऐसे में मदर टेरेसा ने स्कूल से इस्तीफा दिया और गरीबों की सेवा के लिए निकल पड़ीं। कुछ दिनों बाद ही देश का बंटवारा हुआ और मानव इतिहास में इंसानों की सबसे अदला-बदली हुई। लेकिन उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थीं। 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौतें हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए। ऐसी हालत में 1946 में टेरेसा ने गरीबों, लाचारों, बीमारों और असहायों की जीवन भर मदद करने का मन बना लिया था, और वो मन-वचन और कर्म से मानवता की सेवा कर रही थीं।


मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को अल्बेनिया के स्काप्जे में हुआ था। हालांकि इस बीच मदर टेरेसा ने पटना जाकर एक नर्सिंग ट्रेनिंग भी ली। इसके बाद वो फिर वापस 1948 में कोलकाता चली गईं। कुछ समय बाद उन्हें वेटिकन से मिशनरी ऑफ टैरेटी में स्थापना की अनुमति मिल गई और इसके बाद हुआ ये कि…मदर टेरेसा को 14 दिसंबर 1951 में अल्बेनिया की नागरिकता छोड़कर भारत की नागरिकता मिल गई थी। इसके बाद अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए शिशु भवन शुरू किया गया तो वहीं बुजुर्गों के लिए शांति नगर। अब वो बहुत कम सोती थीं उनके जीवन अगर कोई एंट्री थी तो वो दूसरे लोगों की जिन्हें उनकी जरूरत होती थी। वो दिन-रात कुछ ना देखकर केवल जरूरतमंद की मदद किया करती थीं। कम उम्र में उनकी ये लगन उन्हें अब मशहूर बना चुकी थी। इतना मशहूर कि 1997 तक 120 देशों में उनकी मिशनरी 594 आश्रमों में और 3480 सिस्टर के रूप में उनकी ख्याति फैल चुकी थीं। हर सम्मान के आईने में मदर टेरेसा को बेबस, लाचार लोगों का उदास चेहरा दिखता था। जिस पर मुस्कान लाना उनकी जिंदगी का मकसद बन चुका था। और इन मकसदों में कामयाबी के चलते ही मदर टेरेसा को भारत सरकार ने 1962 में पद्मश्री और 1980 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। 1979 को नोबेल शांति पुरस्कार से भी नवाजीं गई मदर टेरेसा। ये दुनिया के सर्वोच्च सम्मानों के शिखर उनकी मशहूरियत और बढ़ा रहे थे। लेकिन 1997 वो साल था जब मदर टेरेसा की सेहत नासाज रहने लगी। लिहाजा अब वो वक्त था जब उन्हें किसी और को अपनी पदवी देनी थी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने मिशनरी ऑफ़ चेरेटी के मुखिया का पद अपनी सहयोगी सिस्टर निर्मला को दे दिया। और करीब 5 महीने बाद 5 सितंबर 1997 को मानवता की मिसाल कही जाने वाली मदर टेरेसा हमेशा हमेशा के लिए चिरनिद्रा में विलीन हो गईं। हालांकि इसके बाद भी उन्हें कभी देश और दुनिया भूली नहीं। उनको पोप जॉन पॉल द्वितीय ने 19 अक्टूबर 2003 को रोम में धन्य घोषित किया। यही नहीं 15 मार्च 2016 को पोप फ्रांसेस ने कार्डेना परिषद में मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने की घोषणा की। लेकिन वो कहते हैं हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है तब कहीं जाकर बड़ी मुश्किल से चमन में दीदा-वर पैदा होता है। मदर टेरेसा भी वही दीदा-वर थीं, जिनकी भावना थी कि मानव को मानव से जोड़ा जाए, संकीर्णता को छोड़ा जाए, प्रेम के फूलों का निर्माण किया जाए, नफरत की दीवारों को तोड़ा जाए, प्रेम भाव के साथ सबको देखा जाए, हर कोई आंख का तारा हो, प्रेम और मानवता की सेवा में डूबा हो, ऐसा सबका जीवन सारा हो, बस यही ध्येय हमारा हो।

Posted by Nandini Bhardwaj

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