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क्या मुसलमानों के लिए पाप है होली खेलना? इतिहास के पन्नों में छिपा है इसका जवाब…

By RNI Hindi Desk 
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नई दिल्ली: आज पूरा देश होली के जश्न में डूबा है। कोरोना के कारण सतर्कता के साथ ये त्योहार मनाया जा रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग के बीच होली सेलेब्रेट किया जा रहा है। होली को हिन्दुओं का त्योहार कहा जाता है। वहीं कई लोग भारत में ये भी कहते सुने जाते हैं कि होली का रंग मुस्लिमों के लिए हराम होता है। मुस्लिम अगर रंग छू लें तो इसे पाप मान लिया जाता है। लेकिन इस बात में आखिर कितनी कितनी सच्चाई है? अगर इतिहास के पन्नों में झांके, तो देखेंगे कि इस बात में बिल्कुल सच्चाई नहीं है। इस बात का सबूत मिला है कि बादशाह अकबर से लेकर जहांगीर तक ने होली खेली है। इसका मतलब है कि मुस्लिमों में रंग को हराम नहीं माना जाता है। सदियों से होली खेलते आ रहे हैं मुसलमान…

भारत में होली को हिन्दुओं का त्योहार कहा जाता है। मुस्लिमों को लेकर धारणा है कि उनके लिए रंग हराम है। इस वजह से मुस्लिम रंग से दूर रहते हैं। लेकिन इस बात में बिलकुल सच्चाई नहीं है। कई मुस्लिम साहित्यकारों ने होली पर नज्म लिखी है।

हिंदी-उर्दू-फ़ारसी के कवि अमीर खुसरो का गीत मोहे अपने रंग में रंग ले निजाम काफी मशहूर है।  खुसरो ने होली और रंगों पर काफी कुछ लिखा है। मुस्लिम शायर उर्दू में रंगों के ऊपर काफी नज्म लिख चुके हैं। इससे पता चलता है कि मुसलमानों के लिए रंग काफी समय से महत्वपूर्ण रहा है।

इतिहास  में देखें तो पाएंगे कि बादशाह अकबर और जोधा ने भी होली खेली थी। हिंदू रानी से शादी के बाद नवाब ने भी होली खेलना शुरू कर दिया था। इसके अलावा जहांगीर ने भी नूरजहां ने भी होली खेलना शुरू कर दिया था। ऐसे में ये कहना है कि मुस्लिमों के लिए रंग हराम है गलत धारणा है।

भारत में ऐसे कई इलाके हैं जो सिर्फ इसलिए मशहूर हो गए क्यूंकि वहां हिंदू नहीं, मुस्लिम जमकर रंग खेलते हैं। इसमें झाँसी का एक गांव वीरा शामिल है, जहां मुस्लिम जमकर गुलाल उड़ाते हैं।

इस गांव में मुस्लिम जमकर अबीर खेलते हैं। हरिसिद्धि देवी के मंदिर में होलिका से पहले अबीर चढ़ाया जाता है। इसके बाद हिंदू-मुस्लिम साथ में रंग खेलते हैं। इसके अलावा भी कई जगहों पर हिंदुओं से ज्यादा मुस्लिम इस पर्व को लेकर उत्साहित दिखते।

इन उदाहरणों को देखकर ये समझा जा सकता है कि होली का त्योहार सिर्फ किसी धर्म विशेष का नहीं है। ये त्योहार तो दिलों का है जो चाहे हिंदू हो या मुस्लिम कोई भी मना सकता है। मुस्लिम भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। और रंगों के जरिये खुशियां बांटते हैं।

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