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दिल्ली: पूर्व मुख्य सचिव के साथ मारपीट मामला,नप सकते हैं आरोपी

By RNI Hindi Desk 
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अक्सर ‘आप’ की सरकार आपको फ्री बिजली,फ्री पानी देने का दावा करती है। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर करने का दावा भी करती है। लेकिन हकीकत क्या है वो जानते हैं आप। अक्सर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का ऑडियो मैसेज जनमानस से जुड़ने के लिए बकायदा एक मिनट का मैसेज, फोन के जरिए जन जन तक पहुंचाया जाता है। लेकिन हकीकत में धरातल तक आपको क्या सुविधाएं मयस्सर हो रही हैं आप जानते हैं। आज बात दिल्ली पूर्व चीफ सेक्रेटरी अंशु प्रकाश से कथित मारपीट की। जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और डेप्युटी सीएम मनीष सिसोदिया समेत कई AAP विधायक जमानत पर घूम रहे हैं। लेकिन अब मामले ने नया मोड़ ले लिया है और हाईकोर्ट से सीएम अरविंद केजरीवाल को बड़ा झटका लगा है। दरअसल बतौर आरोपी कोर्ट में पेश हो चुके सीएम अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के 9 विधायकों को चीफ सेक्रेटरी अंशु प्रकाश से मारपीट के मामले में अब हाईकोर्ट ने राहत देने से मना कर दिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत से मामले में आरोप तय करने को लेकर बहस करने के लिए कहा है। अंशु प्रकाश के आवेदन को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति विभू बाखरू की पीठ ने निचली अदालत में आरोप तय करने पर बहस करने पर रोक लगाने के बीते साल 14 मार्च के अपने फैसले में संशोधन किया। पीठ ने कहा कि जहां तक 14 मार्च के फैसले का सवाल है, उसे संशोधित करते हुए निचली अदालत को आरोप तय करने पर बहस करने की अनुमति दी जाती है। अंशु प्रकाश की तरफ से इसके साथ ही निचली अदालत के निर्देशों को चुनौती देने वाली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की याचिका पर जल्द सुनवाई करने की भी मांग की। निचली अदालत ने अंशु प्रकाश मामले की जांच एसीपी रैंक से नीचे के अधिकारी से न कराने और दिल्ली सरकार द्वारा उन्हें उपलब्ध कराए गए वकील के बजाए दिल्ली पुलिस द्वारा नियुक्त किए गए दो वकीलों को अभियोजक बनाने का निर्देश दिया था। हालांकि, पीठ ने कहा कि ये मामला दो नवंबर को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है और इसे तय तिथि से पहले सुनना संभव नहीं है। सुनवाई के दौरान अंशु प्रकाश का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि समय बचाने के लिए अगर आरोप तय करने के लिए सुनवाई होती है और नियमित लोक अभियोजक पक्ष रखते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। केजरीवाल और सिसोदिया की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील दयान कृष्णन और एन. हरिहरन ने कहा कि निचली अदालत द्वारा नियमित लोक अभियोजक द्वारा मामले को रखे जाने पर उन्हें भी कोई आपत्ति नहीं है। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 22 नवंबर 2018 के आदेश के खिलाफ ‘आप’ नेताओं की याचिका पर दिल्ली सरकार, पुलिस और अंशु प्रकाश को नोटिस जारी किए थे। बता दें कि 22 अक्टूबर 2018 को निचली अदालत ने अंशु प्रकाश का ये अनुरोध स्वीकार कर लिया था जिसमें उन्होंने मामले में पक्ष ‘आप’ सरकार द्वारा तैयार पैनल के वकीलों के बजाय दिल्ली पुलिस द्वारा नामित वकीलों के जरिये रखने का निर्देश देने का अनुरोध किया था। प्रकाश के मुताबिक, 19 फरवरी 2018 को केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर बैठक के दौरान उनके साथ मारपीट की गई। उनकी शिकायत पर आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। केजरीवाल, सिसोदिया और नौ अन्य ‘आप’ विधायकों को 25 अक्टूबर 2018 को निचली अदालत ने जमानत दे दी थी। वहीं मामले में गिरफ्तार दो आरोपी विधायक अमानतुल्लाह खान और प्रकाश जरवाल को हाईकोर्ट से जमानत मिली। बहरहाल मामला कोर्ट के अधीन है वक्त मुकर्रर करेगा कि सही कौन गलत कौन। लेकिन जनाब अगर कोई जनप्रतिनिधि अपने ही मुलाजिम से , अपने ही सहयोगी को सुबह से देर रात तक बार-बार फोन करवाकर बैठक के बहाने अपने आवास पर बुलाये और फिर मारपीट करे। तो क्या ये सब कानून की तौहीन नहीं है? क्या दिलवालों की दिल्ली में दिक्कतों पर गौर करना, उनको सरकार तक पहुंचाना और उनका सरकार से निराकरण करवाना गलत है। जिस पर नौकरशाहों के साथ बदसलूकी की जाती है। हालांकि 14 मार्च 2019 को दिल्ली हाई कोर्ट ने ही अपने आदेश में आरोप पर बहस करने पर स्टे लगा दिया था। लेकिन अब इसी आदेश को हाई कोर्ट ने मॉडीफाई किया है।

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