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गांधी और सावरकर के बीच क्यों हुए मतभेद – अध्याय 3

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Difference of opinion Between gandhi and saavarkar know why ?

वीर सावरकर के बारे में पिछले 2 लेख में आपने पढ़ा उनके बचपन और लंदन में इंडिया हाउस में होने वाली उनकी गतिविधियों के बारे में, मैंने आपको यह भी बताया की सावरकर के बड़े भाई विजयदशमी के दिन महात्मा गाँधी से मिले और वो उनसे बड़े प्रभावित भी हुए थे।

उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है की गांधी जी और सावरकर के बड़े भैया के बीच हमेशा कई ग्रंथो को लेकर चर्चा होती थी जिसमे रामायण और गीता प्रमुख थे, गांधी जी की सोच यह थी की ये मनुष्य के आंतरिक युद्ध का चित्रण मात्र है जबकि सावरकर और उनके बड़े भाई के ऊपर उन ग्रंथो का सजीव प्रभाव पड़ता था।

गांधी जी ने 1926 में गीता पर लिखे अपने भाष्य में इन सब बातो का जिक्र किया है जिसकी चर्चा हम कभी आगे करेंगे लेकिन अभी हम उस क्रन्तिकारी की बात करने जा रहे है जिसे इतिहास ने भुला दिया और माना जाता है की उसी घटना के बाद सावरकर और गांधी जी के बीच दूरी बढ़ गयी थी।

उस क्रन्तिकारी का नाम था मदन लाल ढींगरा, दरअसल 1906 में शिक्षा ग्रहण करने ये लंदन पहुंचे थे और उस दौर में इंडिया हाउस राजनितिक गतिविधियों का केंद्र था जिसे श्यामजी कृष्ण वर्मा चला रहे थे, वीर सावरकर ने ‘फ्री इण्डिया सोसायटी’ का निर्माण किया और सावरकर ने ही मदन लाल को अभिनव भारत का सदस्य बनाया।

सावरकर उनकी देशभक्ति से बहुत प्रभावित थे और यही कारण था की मदन लाल ने गुप्त रूप से अंग्रेज़ो की जानकारी जुटानी शुरू कर दी, उन्हें अंग्रेज समर्थक संस्था ‘इण्डियन नेशनल एसोसिएशन’ का सदस्य बनवाया गया और कर्जन वायली जो की 1 जुलाई 1909 को इस संस्था के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि बनकर आये थे उसी दौरान मदन लाल भी वही थे और उन्होंने उनके चेहरे पर पाँच गोलियाँ दागी; इसमें से चार सही निशाने पर लगीं।

इसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और 17 अगस्त को उन्हें फांसी दे दी गयी, सुनवाई के दौरान उन्होंने हत्या का आरोप सबके सामने कबूल किया और यह भी बोला की उन्हें अपने किये पर कोई खेद नहीं है और मदनलाल मर कर भी अमर हो गये।

इतिहासकारो के कथन से पता चलता है की मदन लाल के इस कृत्य से महात्मा गांधी खुश नहीं थे वही माना यह भी जा रहा था की सावरकर से प्रभावित होकर ही मदन लाल ने यह कार्य किया था, गांधी जी ने वायली की हत्या के बाद लिखा था की जिसने उसे मारा है सजा उसे नहीं बल्कि उसे देनी चाहिए जिसने उसे सिखाया है, मदन तो निर्दोष है, मुझे उस पर दया आती है लेकिन उसने ये नशे में किया है और नशा सिर्फ शराब का नहीं होता बल्कि पागलपन से भरे विचारो का भी होता है।

महात्मा गाँधी जी ने भले ही इस घटना के बाद सावरकर और उनके भाई, सहयोगियों का विरोध किया हो लेकिन यह भी था की वो उनकी देश भक्ति और ऊर्जा से बेहद प्रभावित थे और यही कारण था की उन्होंने सावरकर को न सिर्फ वीर कहकर सम्बोधित किया बल्कि उनके समर्थन में चिट्ठी भी लिखी।

तो अगले लेख में जानिये की आखिर इतने मतभेदों के बावजूद क्या ऐसा हुआ की गांधी जी ने उनके समर्थन में लेख लिखा और उनकी रिहाई के भी प्रयास किये, सावरकर को क्यों हुई थी कालेपानी की सजा ? आखिर क्या होती है यह सजा ? इन सब सवालो के जवाब अगले लेख में।

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