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क्यों मनाई जाती है अक्षय तृतीया? जानिए पूरी वजह..

हिंदु परंपराओं में अक्षय तृतीया बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए कामों का कभी क्षय नहीं होती। वो हमेशा बने रहते हैं। इसे अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, अबूझ मुहूर्त यानी इस दिन कोई भी काम ग्रह स्थिति और शुभ मुहूर्त देखकर नहीं किया जाता।

By RNI Hindi Desk 
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हिंदु परंपराओं में अक्षय तृतीया बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए कामों का कभी क्षय नहीं होती। वो हमेशा बने रहते हैं। इसे अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, अबूझ मुहूर्त यानी इस दिन कोई भी काम ग्रह स्थिति और शुभ मुहूर्त देखकर नहीं किया जाता। पूरा दिन ही शुभ मुहूर्त माना गया है। ऐसा क्यों है कि इस तिथि को अक्षय यानी जिसका कभी क्षरण ना हो, जो हमेशा कायम रहे, कहा जाता है। इसके पीछे कई पौराणिक मान्यताएं हैं

अक्षय तृतीया को सबसे ज्यादा भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। परशुराम उन आठ पौराणिक पात्रों में से एक हैं जिन्हें अमरता का वरदान मिला हुआ है। इसी अमरता के कारण इस तिथि को अक्षय कहते हैं, क्योंकि परशुराम अक्षय हैं। भगवान परशुराम के जन्म के अलावा भी कुछ और पौराणिक घटनाएं हैं, जिनका अक्षय तृतीया पर घटित होना माना जाता है

बैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया को आखा तीज मनाई जाती है। इसे अक्षय तृतीया कहते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन सोना, चांदी या जो भी धातु खरीदी जाती है, वो कभी नष्ट नहीं होती। इसके अलावा जो दान पुण्य किया जाता है, उसका भी कई गुना, अक्षय फल मिलता है।  इस बार मंगलवार 3 मई को मनाई जाएगी।

ज्योतिषियों की मानें तो इस दिन किया गया दान आपके अगले जन्म तक फल देता है। इस दिन मां लक्ष्मी को पाना है तो विष्णु जी की अराधना कर सकते हैं। इसके अलावा पितरों को याद करना भी इस दिन बहुत महत्वपूर्ण है, इस दिन हो सके तो विष्णु भगवान और पितरों के नाम का कलश दान करना चाहिए।  आखा तीज पर दो कलश का दान महत्वपूर्ण होता है। इसमें एक कलश पितरों का और दूसरा कलश भगवान विष्णु का माना गया है। पितरों वाले कलश को जल से भरकर काले तिल, चंदन और सफेद फूल डालें।

अक्षय तृतीया इस बार मंगल रोहिणी नक्षत्र के शोभन नक्षत्र में मनाई जाएगी। शुभ योग में अक्षय तृतीया मनाने का यह संयोग 30 साल बाद बना है। इतना ही नहीं 50 साल के बाद ग्रहों की विशेष स्थिति बन रही है। अक्षय तृतीया पर चन्द्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ और शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे, वहीं शनि स्वराशि कुम्भ और बृहस्पति स्वराशि मीन में विराजमान रहेंगे। चार ग्रहों का अनुकूल स्थिति में होना अपने आप में बहुत खास है।

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