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वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन मुहूर्त की जानकारी, कैसे मिलेगी कृपा !

By RNI Hindi Desk 
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हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो में माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को वसंत पंचमी के नाम से जाना जाता है, इस दिन माता सरस्वती की पूजा होती है।

दरअसल यह शब्द ऋतुओं के राजा वसंत के आगमन का सूचक है और उसी के नाम पर इसे वसंतऔर शुक्ल पक्ष की पंचमी के नाम पर इसे वसंत पंचमी बोला गया, बाग़-बगीचों में खिलते रंग-बिरंगे पुष्पों पर मंडराते भंवरे और पक्षियों का मधुर कलरव अगर हो तो समझ जाइये की वसंत ऋतु बस आ गयी है।

सरस्वती की पूजा का मुहूर्त –

वसंत पंचमी 29 जनवरी को है और इस दिन सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग भी रहेगा जिसके कारण यह दिन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, तिथि 29 को सुबह 10.45 बजे से शुरू होगी और अगले दिन 30 जनवरी गुरुवार दोपहर 1.20 बजे तक रहेगी।

29 जनवरी 2020, बुधवार को वसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त 10.45 से 12.35 तक है वही 30 जनवरी 2020, गुरुवार को वसंत पंचमी का शुभ मुहूर्त 6.00 से 7.30, और 12.20 से 1.20 बजे तक रहने वाला है।

माता सरस्वती पूजन की विधि –

धर्म ग्रंथों में सरस्वती को ज्ञान की देवी का दर्जा दिया गया है और माना जाता है कि इस दिन सरस्वती की पूजा करने से मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस दिन सुबह मनुष्य को जल्दी सुबह उठकर सरस्वती की पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान गणेश जी का ध्यान करे क्यूंकि वो सभी देवताओं में प्रथम है।

पुराण के अनुसार सफेद पुष्प, चन्दन, श्वेत वस्त्रादि से देवी सरस्वती जी की पूजा करना चाहिए। सरस्वती जी का पूजन करते समय सबसे पहले उनका स्नान कराना चाहिए इसके पश्चात माता को सिन्दूर व अन्य श्रृंगार की सामग्री चढ़ाएं। इसके बाद फूल माला चढ़ाएं। इसके बाद फूलों से मां सरस्वती पूजन स्थल का श्रृंगार करें।

पूजा की शुरुआत हमेशा पूर्व या उत्तर की दिशा की तरफ मुंह कर करें। वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती का मूल मंत्र ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः का जाप जरूर करें। ये जाप हल्दी के माला से करना सर्वोत्तम होगा।

पीले चावल से ॐ लिखे और खुद भी पीले वस्त्र धारण करें, इसके बाद मां सरस्वती की आराधना करते समय यह श्लोक जरूर पढ़ें।

ॐ श्री सरस्वती शुक्लवर्णां सस्मितां सुमनोहराम्।।
कोटिचंद्र प्रभामुष्ट पुष्ट श्रीयुक्त विग्रहाम्।
वह्निशुद्धां शुकाधानां वीणा पुस्तकम धारिणीम्।।
रत्नसारेन्द्र निर्माणनव भूषण भूषिताम्।
सुपूजितां सुरगणै ब्रह्मविष्णुशिवादिभि:।। वन्दे भक्तया वन्दिता च…

पूजन करने के बाद आप माता को केसर खीर का भोग लगाए और बड़े प्रेम और शृद्धा से उसे छोटे बच्चों में बांटकर खुद भी उसे ग्रहण करे।

सरस्वती और लक्ष्मी में शत्रुता के उदाहरण ?

शास्त्रों में वर्णन है कि लक्ष्मी और सरस्वती दोनों एक दूसरे की विरोधाभासी है, सतो गुण प्रधान होकर लक्ष्मी सरस्वती हो जाती है और तमोगुण प्रधान होकर वह काली हो जाती है और सत और तम में तो हमेशा से विरोधभास रहा है। एक पौराणिक उल्लेख अनुसार देवी महालक्ष्मी से जो उनका सत्व प्रधान रूप उत्पन्न हुआ, देवी का वही रूप सरस्वती कहलाया।

देवी सरस्वती का वर्ण श्‍वेत है। कहा जाता है कि सरस्वती के साधकों को अक्सर लक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती है और महाभारत काल की एक घटना से इसकी पुष्टि होती है, पांडवों को धनुर्विद्या सिखाने वाले द्रोणाचार्य का जीवन भारी गरीबी में बीता. वेद-वेदांग में पारंगत इस विद्वान का यश जब सभी दिशाओं में गूंज रहा था उसके बाद भी इनके जीवन में धन की कमी रही।

राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य दोनों भारद्वाज मुनि के आश्रम में सहपाठी थे, द्रुपद ने वादा किया था की वो द्रोण को अपना आधा राज्य सौंप देंगे लेकिन जब वो वहां धन मांगने की इच्छा से गए तो उन्हें अपमान के सिवा कुछ प्राप्त नहीं हुआ।

वही लक्ष्मी की बात करे तो राजा परीक्षित पृथ्वी के राजा थे लेकिन उन्होंने शमीक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया था क्यूंकि उन्हें लगा की ऋषि ने उनका सत्कार नहीं किया और उसके बाद उन्ही के पुत्र श्रृंगी ने राजा को तक्षक नामक सर्प के द्वारा डसने का श्राप दिया, यह भी एक उदाहरण है कि कैसे चिर लक्ष्मी के होते हुए भी ज्ञान की कमी के कारण राजा को श्राप मिला।

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