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Navratri 2nd Day 2021: जानिए क्या है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि और प्रसाद, करें इन मंत्रों का जाप…

Navratri 2nd Day Maa Brahmcharini: नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के दूसरे रुप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। मां का यह रूप काफी शांत और मोहक है। कठोर तपस्या के कारण इनका नाम तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी पड़ा।

By Amit ranjan 
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नई दिल्ली : नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के दूसरे रुप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ब्रह्मचारिणी का अर्थ, ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण से है, यानी ये देवी तप का आचरण करने वाली हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी हिमालय की पुत्री थीं, जिन्होंने नारद के उपदेश के बाद भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। इस कारण इनका नाम तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी पड़ा। मां का यह रूप काफी शांत और मोहक है।

ऐसा माना जाता है कि जो भक्त मां के इस रूप की सच्चे मन से पूजा करता है उसकी हर मनोकामना पूरी होती है। मां का यह स्‍वरूप आपको ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए प्रेरित करता है। मां ब्रह्मचारिणी (Maa Brahmcharini) श्वेत वस्त्र पहने दाएं हाथ में अष्टदल की माला और बांए हाथ में कमण्डल लिए हुए सुशोभित है। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर या शक्कर से बनी चीजों का भोग चढ़ाया जाता है, जिससे मां प्रसन्न होती है।

मां ब्रह्मचारिणी को लगाए ये भोगः

मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर से बनी चीजें काफी प्रिय हैं। शक्कर से कई तरह के व्यंजन बनाए जाते हैं। आप माता को शक्कर से बनी खीर का भोग लगा सकते हैं। खीर एक बहुत ही स्वादिष्ट प्रसाद है। अगर आप नौ दिनों का व्रत कर रहे हैं तो आप व्रत वाली खीर बना के भोग लगाएं। भोग के बाद आप भी इसे खा सकते हैं।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधिः

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने के लिए इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। इसके बाद मंदिर को अच्छे से साफ करें। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर उनका ध्यान करें और प्रार्थना करें। इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें। देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं। इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें।

मां ब्रह्मचारिणी के मंत्रः

या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता.

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू.

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

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