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जानिए कैसे मिला था गंगा पुत्र भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान : पढ़िए रोचक कथा

By RNI Hindi Desk 
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महाभारत को इस दुनिया का सबसे वैज्ञानिक ग्रन्थ कहा गया है। इसे ना सिर्फ महाकाव्य की संज्ञा दी गई है बल्कि इसे पंचम वेद भी कहा गया है। इस ग्रंथ के मुख्य पात्रों की बात की जाये तो हम भीष्म पितामह को नजरअंदाज नहीं कर सकते है।

गंगा पुत्र भीष्म शांतनु के पुत्र थे और उन्हें माँ गंगा ने ही पाला था , 13 साल के बाद उन्होंने उन्हें शांतनु को सौंप दिया था। भीष्म का नाम देवव्रत था। जब वो अपने पिता के साथ रहने लगे तो उनके पिता उन्हें बहुत स्नेह करते थे।

लेकिन उनके जीवन में एक अकेलापन भी था, गंगा के जाने के बाद वो अकेलापन महसूस करते थे और अक्सर वो गंगा तट पर जाकर एकांत में बैठ जाते। एक दिन उन्होंने सत्यवती को देखा जो नदी में नाव चलाती थी।

सत्यवती के पुत्र के रूप में वेदव्यास पैदा हुए थे लेकिन पराशर के आशीर्वाद से उसका कौमार्य भंग नहीं हुआ था। शांतनु सत्यवती के प्रेम में कैद हो गए और उससे मेल मिलाप बढ़ा लिया।

एक दिन उन्होंने विवाह की इच्छा रखी। इसके बदले में सत्यवती के पिता ने कहा की मैं आपको अपनी बेटी दे दूंगा लेकिन हस्तिनापुर का राजकुमार देवव्रत नहीं बल्कि उसका पुत्र होना चाहिए।

शांतनु को ये स्वीकार नहीं था। वो अपने पुत्र के साथ अन्याय नहीं कर सकते थे और यही कारण था की उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया लेकिन उसके बाद वो अकेलापन और अधिक उन्हें परेशान करने लगा।

देवव्रत अपने पिता के मन की बात को समझ गए और सत्यवती के पिता के पास पहुंचे। जब उन्हें सभी बातों का ज्ञान हुआ तो अपने पिता के सुख के लिए और सत्यवती की होने वाली संतानो के लिए एक अखंड प्रण ले लिया।

उन्होंने प्रतिज्ञा की, मैं अपने जीवन में कभी विवाह नहीं करुँगा और जीवन भर हस्तिनापुर के सिंहासन की रक्षा करुँगा। इस अखंड प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम भीष्म हुआ और उसके बाद उन्हें शांतनु ने इच्छा मृत्यु का वरदान दे दिया।

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