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JNU की लड़ाई अब कश्मीर पर आयी : एजेंडा खुलकर आया सामने

By RNI Hindi Desk 
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कहते हैं कि गीदड़ की मौत आती है तो वो शहर की और भागता है और इस देश में मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ लोगो पर यह बात लागू हो रही है और अब धीरे धीरे सारे देश विरोधी लोग अपने बिल से बाहर आ रहे है और इसी कड़ी में नया नाम अब JNU और उसमे पढ़ रहे वामपंथी छात्रों का है जिनका एजेंडा खुद उनकी ही अध्यक्ष आइशी घोष ने बेनकाब कर दिया है।

दरअसल जिन लोगों को यह लड़ाई JNU के कैंपस तक सिमटती हुई दिखाई दे रही थी उनकी आँख खोलने के लिये आइशी घोष का एक बयान ही काफी है जिसमें वो खुलेआम लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाती हुई दिखाई दे रही है और आखिरकार देर से ही सही उन्होंने यह साबित कर दिया कि उनका एजेंडा ना ही फीस वृद्धि से जुड़ा हुआ है और ना ही गरीब स्टूडेंट्स से, उनका असली दर्द तो कश्मीर है जिसका सही मायनों में देश में पूर्ण विलय 5 अगस्त 2019 को हुआ जब देश के गृह मंत्री अमित शाह ने धारा 370 हटाकर भारत माता के सीने पर 70 सालों से लदे हुए बोझ को एक झटके में हल्का कर दिया था।

कल JNUSU कीअध्यक्ष आइशी घोष ने जामिया में चल रहे धरने में हिस्सा लिया और छात्रों को संबोधित किया जो नागरिकता कानून के खिलाफ सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे, वहां आइशी ने कश्मीर का जिक्र किया, अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नागरिकता कानून का कश्मीर से ना ही कोई लेना देना है और ना ही इस देश के लोगों से, उसके बाद भी प्रदर्शन अगर हो रहा है तो किसके खिलाफ ? आइशी ने अचानक से इस प्रदर्शन में कश्मीर का जिक्र क्यों किया ?

सबसे पहले उनके बयान पर नज़र डालते है कि उन्होंने आखिर कहा क्या है ? दरअसल आइशी ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा ” इस लड़ाई में हम कश्मीर को पीछे नहीं छोड़ सकते, ये कश्मीर के ही हक़ की लड़ाई है और इससे पीछे नहीं हटा जा सकता। वहां के लोगों के साथ जो हो रहा है वह बहुत ही ग़लत हो रहा है और हर मंच से हम उनके हक़ की लड़ाई लड़ेंगे। कश्मीर से ही इस सरकार ने शुरू किया था कि हमारे संविधान को हमसे छीना जाए। ”

हम सब इस बात को जानते है कि कश्मीर में पिछले 70 सालों से धारा 370 का दुरूपयोग किया गया और उसके सहारे घाटी में आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया है, इस आर्टिकल 370 के कारण ही कश्मीर के दलित वर्ग को अधिकार नहीं मिले वही कश्मीर की महिलाओं के साथ भी इस आर्टिकल 370 के कारण उचित न्याय नहीं हुआ और जब उसी धारा 370 को हटाकर महिलाओं को केंद्र सरकार ने उचित अधिकार दिये है तो इन वामपंथी छात्रों को क्यों कष्ट हो रहा है ? दलित अधिकारों पर मोदी सरकार को घेरने वाले यही संगठन कश्मीर घाटी में दलितों को मिल रहे उनके अधिकारों पर चुप क्यों है ?

आखिर इस बैचेनी को क्या समझा जाये ? जिस धारा 370 के कारण देश के हज़ारों जवानों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी उसका निस्तारण करना बेहद आवश्यक था और जब देश कि संसद में चुने हुए सांसदों ने खुद इसका समर्थन किया तो क्या अब आइशी घोष यह बतायेगी कि यह संविधान विरोधी कदम कैसे हुआ ? देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद क्या अब इन वामपंथी छात्रों से पूछकर कानून बनायेगी ? इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि अगर आपकी पसंद का कानून नहीं बनेगा तो क्या आप सड़कों पर आ जायेगे ? देश में अराजकता का माहौल बना देंगे ?

यह सिर्फ आज की बात नहीं है, इससे पहले भी नागरिकता कानून के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में एक महिला आंदोलनकारी के द्वारा “फ्री कश्मीर” के पोस्टर लहराये गये थे तो ये पूछना लाजमी है कि क्या आंदोलन की आड़ में कही आप अलगाववाद को बढ़ावा तो नहीं दे रहे ! जब एक बार केंद्र सरकार कश्मीर में शांति बहाली को लेकर बड़ा निर्णय ले चुकी है तो आप देश की सरकार के खिलाफ जाकर हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली क्यों बन रहे है ?

अंत में यही कि एक बार फिर JNU के वामपंथी छात्रों का सच देश के सामने है और अब ये साफ़ हो गया है की इन्हे ना छात्रों की चिंता है और ना ही चिंता है देश के भविष्य की, इनको दिक्क्त प्रधानमंत्री मोदी से है और उनके द्वारा किये जा रहे विकास कार्यों से है जिसके कारण बार बार देश के विकास कार्यों को बाधित करने के लिये ऐसे फ़र्ज़ी आंदोलन खड़े किये जाते है जिनसे हम सबको बचकर रहना होगा।

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