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स्वर्ग की छठी सीढ़ी: सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करना होता है

By RNI Hindi Desk 
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{ श्री अचल सागर जी महाराज की कलम से }

पिछले लेख में आपने स्वर्ग की पांचवी सीढ़ी के बारे में पढ़ा, इसमें  इंसान का वास्तविक जीवन शुरू होता हैं। दरअसल उसने जो ज्ञान अर्जित किया होता है उसे अपने कर्मों से सार्थक करना होता है ताकि उसका जीवन सफल हो सके।

सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि इसी उम्र में इंसान का पारिवारिक जीवन शुरू होता है। उसका विवाह होता है। इसके बाद वो सारे सुख भोगते हुए आगे के जीवन की रूपरेखा तैयार करता है।

इसके बाद आती है छठी सीढ़ी, दरअसल इस समय व्यक्ति को अपनी पारिवारिक और सामाजिक ज़िम्मेदारी को निभाना होता है। इस चक्र में जीवन में जो कमाया और जो खर्चा किया उसका हिसाब किताब करने के बाद तीर्थ स्थलों की यात्रा करने का समय होता है।

इस जीवन काल में मनुष्य अपने बच्चों को उनके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश करता है। हर व्यक्ति अपने सामर्थ्य से अपने बच्चों को कुछ ना कुछ बना देता है। वो चाहे किसान हो या कोई बड़ा अधिकारी ! इसी दौरान अपनी संतान को अच्छे संस्कार देना भी जरुरी होता है।

कर्म ही सच्ची ईश्वर की पूजा है ऐसा मानते हुए व्यक्ति कुंडली के गुण दोष का ध्यान रखते हुए अपने पुत्र पुत्रीयों का विवाह करता है और संन्यास की और अग्रसर होता है।

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